महराजगंज। महज एक प्रतिशत कमीशन के लालच में दलाल महिलाओं को कर्ज के दलदल में फंसा देते हैं। हालत यह कि ब्याज बढ़ता गया और किस्त जमा करते करते महिलाएं कंगाल हो गईं।
कुछ महिलाएं तो दिन में घर छोड़कर इधर-उधर रहती हैं, तो कुछ हर रोज एजेंटों की तीखी बातों को सहन करने को अभिशप्त हैं। दलाल पहले महिलाओं की जरूरत से जुड़ी कमजोरी को समझते हैं, इसके बाद आसानी से ऋण दिलाने की बात कर उन्हें जाल में फंसा लेते हैं।
इस पूरे खेल को समझने के लिए पनियरा क्षेत्र के बैदा गांव का रुख करना पड़ा। इस क्षेत्र के अलग-अलग गांवों में तमाम महिलाएं कई कंपनियों से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर रही हैं। दरअसल कर्ज दिलाने के खेल में दलालों की इंट्री ने मामले को उलझा दिया है। कंपनियों के एजेंट गांवों में दलालों को सेट कर रखे हैं। इन्हीं के जरिए जरूरतमंद महिलाओं को कर्ज आसानी से मुहैया करा देते हैं।
सूत्रों की माने तो इस खेल में दलालों का एक प्रतिशत कमीशन तय रहता है। कर्ज देने के दौरान मूल रकम से उनके हिस्से की रकम काट कर दे दी जाती है। बैदा गांव में टहलते हुए इंद्रभान मिले। इस मुद्दे पर उनके बातचीत करने पर शुरू में वे खामियों को गिनाने लगे। फिर अचानक संभलते हुए बोले कि दूसरे की बात करने से क्या फायदा होगा। इससे बेवजह की समस्या ही पैदा होगी। अनुरोध करने पर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से जुड़े दलालों की पोल खोलने लगे।
उन्होंने बताया कि माइक्रो फाइनेंस समेत विभिन्न समूहों के एजेंटों का मकड़जाल ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है। इन एजेंटों ने गांवों में अपने दलालों को सेट कर रखा है। एक प्रतिशत कमीशन पर महिलाओं को कर्ज दिलाते हैं। दलाल अनपढ़ और आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को आसानी से अपने जाल में फंसा लेते हैं और उन्हें 30 से 50 हजार रुपये तक का ऋण दिला देते हैं।
महिलाएं यह समझ नहीं पातीं कि इस ऋण पर 22 से 25 प्रतिशत तक का भारी ब्याज वसूला जाता है। धीरे-धीरे ब्याज की रकम बढ़ती जाती है और महिलाएं इसे चुकाने में असमर्थ हो जाती हैं। इंद्रभान से बातचीत करने के बाद दलालों का खेल समझ में आ गया। पास के ही गांव देवीपुर में विमला देवी मिलीं। उन्होंने बताया कि एक साल पहले बेटी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी। इसी दौरान माइक्रो फाइनेंस समूह से जुड़े दलाल को इस बात की जानकारी मिली।
दलाल घर आया और कहा की यदि बेटी का इलाज कराना चाहती हैं तो समूह से ऋण दिलवा दूंगा। आर्थिक तंगी के कारण विमला ने उसकी बातों में आकर 40-40 हजार रुपये की दो किश्तें लीं, वहीं ब्याज दर अधिक होने के कारण धीरे-धीरे ऋण की राशि बढ़ती गई। इसे चुकाने के लिए विमला को अपने घर का सामान और जेवर तक बेचने पड़े। किसी तरह वह कर्ज से मुक्ति पा सकी।
विमला ने बताया कि अब वह दोबारा कभी समूह से रकम नहीं लेगी। देवीपुर गांव में श्रीकांती कहने लगीं कि दलाल गांव में यह पता करते हैं कि कौन सा परिवार परेशानी में है। इसकी भनक लगते ही वे अपना काम शुरू कर देते हैं। दलाल घर पर आते ही बच्चों को मिठाई, बिस्किट के लिए पैसा देकर हमदर्दी जताते हैं। श्रीकांती कहती हैं कि समस्याओं में फंसे रहने के कारण किसी को कोई रास्ता नहीं सूझता है। ऐसे में रकम लेकर हर कोई फंस ही जाता है।
महिलाओं को लगता है कि यह ऋण उनके घर की जरूरतें पूरी करने के लिए है, लेकिन वे यह नहीं जानतीं कि इससे निकल पाना बहुत मुश्किल होगा। एक बार ऋण लेने के बाद महिलाएं लगातार किस्तें भरने के दबाव में आ जाती हैं। जब वे समय पर भुगतान नहीं कर पातीं, तो एजेंट और दलाल लगातार घर पर आकर वसूली का दबाव बनाते हैं।