पूर्वांचल के पहले बटरफ्लाई (तितली) पार्क का इंतजार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कहां तो उम्मीद थी जल्द पार्क विकसित होने से यहां पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी, जिससे क्षेत्र का विकास होगा, लेकिन पार्क की मंजूरी मिलने के चार साल बाद भी इसके लिए आज तक शासन से कोई बजट जारी नहीं किया गया।
दर्जिनिया ताल पर पूर्वांचल का पहला बटर फ्लाई पार्क बनाने के लिए वन विभाग ने वर्ष 2019 में ही कार्ययोजना तैयार की थी। लेकिन बजट न मिलने के लिए यह कार्ययोजना चार वर्ष बाद भी पूरा नहीं हो सका। नेपाल राष्ट्र के हिमालय पर्वत की चोटियों से निकली नारायणी नदी का किनारा एवं सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग अंतर्गत निचलौल रेंज के मनोरम वादियों के बीच स्थित दर्जिनिया ताल पर्यटकों को आकर्षित करने की पूरी क्षमता रखता है। लेकिन पर्यटन के लिहाज से यहां सुविधाएं नहीं होने के कारण इन दिनों पर्यटक कम आ रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2019 में विभाग ने दर्जिनियां ताल के पास 80 लाख की लागत से 50 डिस्मिल भूमि पर पूर्वांचल का पहला बटरफ्लाई पार्क बनाने के लिए प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा था। लोगों में इसके लिए काफी उत्सुकता थी। पर शासन से इसकी मंजूरी मिल जाने के चार वर्ष बाद भी बजट जारी नहीं होने से पर्यटक निराश हैं। प्रस्ताव के मुताबिक पार्क में तकरीबन 70 मीटर इंटरलॉकिंग सड़क बननी थी, जहां पर्यटक आराम से घूमते हुए सैकड़ों प्रजाति की रंग बिरंगी तितलियों को देख कर लुत्फ उठा सकें। वहीं पार्क में एंट्री गेट, ओक ट्री सहित अनेक प्रजाति के प्लांट भी लगाए जाने थे। लेकिन यह सब आज भी सपने जैसा ही है।
निचलौल वन क्षेत्राधिकारी सुनील राव का कहना है कि बजट न मिलने की वजह से पार्क का काम नहीं हो सका। हालांकि मगरमच्छों का घर दर्जिनियां ताल और नारायणी नदी के तट को पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए विभाग की ओर से प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया गया है। रकम मिलने के बाद काम को शुरु कराया जाएगा।
पांच हेक्टेयर के ताल में रहते हैं सैकड़ों मगरमच्छ
विभाग ने बटरफ्लाई पार्क के साथ ही दर्जिनिया ताल और नारायणी नदी के टेल फॉल को विकसित करने की भी योजना बनाई थी। इसके तहत नारायणी नदी में घड़ियालों के संरक्षण के लिए लखनऊ कुकरैल प्रजनन केंद्र से 42 मादा और 13 नर घड़ियालों को लाकर छोड़ा गया। रेंज कार्यालय के मुताबिक मनोरम वादियों के बीच दर्जिनिया ताल करीब पांच हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है। जो मगरमच्छों के लिए अनुकूल है। यही कारण है कि ताल में मगरमच्छों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। अब ताल में मगरमच्छों की संख्या करीब पांच सौ के पास पहुंच चुकी है। पिछले एक वर्ष में करीब 50 हजार पर्यटक दर्जिनिया ताल में मगरमच्छ देखने पहुंचे हैं। हालांकि बीते कुछ समय से पर्यटकों की संख्या में निरंतर कमी आ रही है।
ताल पर पहुंचने के लिए देना पड़ता है सुविधा शुल्क
वन विभाग पर्यटकों के लिए दर्जिनिया ताल पर सुविधाएं भले ही मुहैया नही करा पा रहा हो। लेकिन पर्यटकों से सुविधा शुल्क की वसूली करना नहीं भूला है। ताल के पूर्वी गेट पर बैरियर लगाकर बैठे वनकर्मी विजय बहादुर ने बताया कि उच्चाधिकारियों के निर्देश के अनुसार ताल पर पहुंचने वाले पर्यटकों से पहले शुल्क जमा कराया जाता है। फिर ताल पर जाने के लिए एक रसीद दी जाती है।