अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष से बिगड़े हालात
प्लास्टिक बोरे के प्रोडक्शन कॉस्ट पर 10 से 15 फीसदी तक की बढ़ोतरी
गोरखपुर। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष का असर अब अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ स्थानीय उद्योगों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण प्लास्टिक और टेक्सटाइल उद्योगों की उत्पादन लागत तेजी से बढ़ गई है। इसका सीधा असर गोरखपुर के गीडा और इंडस्ट्रियल एरिया में संचालित छोटी-बड़ी यूनिटों पर पड़ रहा है। उद्यमियों के अनुसार, कच्चे माल की कीमतों में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है जिससे उत्पादन और बाजार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
प्लास्टिक उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि प्लास्टिक दाना, जो इस उद्योग का मुख्य कच्चा माल है, उसकी कीमतों में अचानक तेज उछाल आया है। करीब एक सप्ताह पहले जो प्लास्टिक दाना 90 से 95 रुपये प्रति किलो तक मिल रहा था, वह अब करीब 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इतनी ऊंची कीमत पर भी बाजार में इसकी उपलब्धता सीमित है। इसके चलते कई यूनिटों ने उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है और केवल उन्हीं ऑर्डर पर काम किया जा रहा है, जिनके लिए पहले से अनुबंध हो चुका है।
इंडस्ट्रियल एरिया में प्लास्टिक बोरे बनाने वाली यूनिटों पर भी इस महंगाई का गहरा असर पड़ा है। बोरे के उत्पादन की लागत में करीब 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। एक उद्यमी के अनुसार, सीमेंट और फर्टिलाइजर कंपनियों के साथ पूरे साल का अनुबंध रहता है, ऐसे में पुराने रेट पर सप्लाई करना बेहद मुश्किल हो गया है। कंपनियां अनुबंध का हवाला देकर आपूर्ति का दबाव बना रही हैं, जिससे उद्योगपतियों की चिंता बढ़ गई है।
20 प्रतिशत तक कीमतों में बढ़ोतरी
टेक्सटाइल क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इंडस्ट्रियल एरिया स्थित बीएन डायर्स में सिंथेटिक धागा पेट्रोलियम उत्पादों का ही बाई प्रोडक्ट है। कंपनी के प्रमुख विष्णु अजीत सरिया के अनुसार, एक सप्ताह के भीतर दो बार में करीब 20 प्रतिशत तक कीमतों में बढ़ोतरी हो चुकी है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ गई है और उत्पादन पर असर दिखने लगा है। चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष आरएन सिंह ने कहा कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के बावजूद पुराने अनुबंधों के कारण उद्यमियों पर पुराने रेट पर आपूर्ति का दबाव बनाया जा रहा है। इससे छोटे उद्योगों के सामने संकट खड़ा हो सकता है।
50 से अधिक यूनिटों में होता है प्लास्टिक का इस्तेमाल
गीडा से लेकर इंडस्ट्रियल एरिया तक करीब 50 से अधिक छोटी-बड़ी यूनिटें ऐसी हैं जहां प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। बिजली वायरिंग के लिए पाइप बनाने वाली छह से अधिक यूनिटों में भी उत्पादन कम कर दिया गया है। पीवीसी रेजिन जो एक सप्ताह पहले 70 रुपये प्रति किलो था, वह अब 130 रुपये तक पहुंच गया है। कीमतों में इस अस्थिरता के कारण उत्पादन योजना बनाना मुश्किल हो गया है। प्लास्टिक उत्पादों की महंगाई का असर इलेक्ट्रिक सामान और घरेलू उपकरणों पर भी दिखने लगा है। प्लास्टिक के साथ-साथ कॉपर और एल्युमिनियम की कीमतों में बढ़ोतरी से कूलर, वाशिंग मशीन, पंखा और वायरिंग के तार जैसे उत्पाद महंगे हो गए हैं। उद्यमियों के अनुसार, एक कूलर की कीमत में 300 से 400 रुपये तक का इजाफा हो गया है।