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Maharajganj News: रमजान, जिंदगी में आत्मचिंतन और आत्मसुधार का खास दौर

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दिल को साफ करने का मौका देता है दूसरा अशरा
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रमजान में अपने पिछले कर्मों का हिसाब खुद से लेने की कोशिश करता है बंदा
सिसवा बाजार। रमजान का दूसरा अशरा जिंदगी में आत्मचिंतन और आत्मसुधार का खास दौर लेकर आता है। यह वह समय है जब बंदा अपने पिछले कर्मों का हिसाब खुद से लेने की कोशिश करता है। अपने रब की बारगाह में झुककर सच्चे दिल से माफी की दरख्वास्त करता है। अगर पहला अशरा रहमत की बारिश लेकर आता है तो दूसरा अशरा उस रहमत को पाने के लिए दिल को साफ करने का मौका देता है।
बीजापार निवासी मौलाना अमालुद्दीन ने बताया कि इंसान से गलतियां होना स्वाभाविक है। कभी शब्दों से, कभी व्यवहार से और कभी इरादों से भी गुनाह हो जाते हैं। मगर सबसे अहम बात यह है कि क्या इंसान को अपनी गलती का एहसास है और क्या वह उसे सुधारने की कोशिश करता है। रमजान का यह हिस्सा हमें इसी एहसास की तरफ जगाता है।
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दिन भर का रोजा केवल भूख और प्यास सहने का अभ्यास नहीं, बल्कि अपने नफ्स पर काबू पाने का प्रशिक्षण है। जब इंसान अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख लेता है, तो उसके लिए बुराइयों से दूर रहना आसान हो जाता है। मगफिरत का मतलब केवल गुनाहों की माफी नहीं बल्कि दिल का बोझ हल्का होना भी है। जब कोई व्यक्ति अपने रब से माफी मांगता है, तो उसके अंदर एक नई उम्मीद पैदा होती है।
उसे महसूस होता है कि उसके लिए सुधार का रास्ता खुला है। यही उम्मीद इंसान को निराशा से बचाती है और उसे आगे बढ़ने की ताकत देती है। रमजान का दूसरा अशरा हमें सिखाता है कि चाहे गुनाह कितने भी बडे़ क्यों न हों, सच्ची तौबा के दरवाजे बंद नहीं होते। इस दौर में इबादतों की रूहानी मिठास और भी बढ़ जाती है। नमाज में एक अलग तरह की तल्लीनता महसूस होती है, कुरआन की तिलावत दिल को सुकून देती है और दुआ में आंखें नम हो जाती हैं। यह नम आंखें ही असल में इंसान की सच्चाई का सबूत होती हैं। जब दिल झुकता है, तभी जुबान से निकली दुआ असर करती है।
मगफिरत का यह संदेश केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता। समाज में फैली कटुता, ईर्ष्या, नफरत और मनमुटाव को दूर करने का भी यही सबसे उपयुक्त समय है। अगर हमने किसी का हक मारा है, किसी का दिल दुखाया है या किसी के साथ नाइंसाफी की है तो केवल इबादत काफी नहीं होती।
हमें उस इंसान से भी माफी मांगनी चाहिए और उसके हक को अदा करना चाहिए। असल मगफिरत तभी मुकम्मल होती है जब इंसान अपने रब के साथ-साथ उसके बंदों के सामने भी साफ दिल से खड़ा हो सके। आज के दौर में भागदौड़ भरी जिंदगी ने इंसान को आत्ममंथन से दूर कर दिया है।
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रमजान का दूसरा अशरा इस भागदौड़ में ठहरने का अवसर देता है। यह वक्त है अपनी प्राथमिकताओं को समझने का, अपनी कमियों को पहचानने का और अपने चरित्र को बेहतर बनाने का। यदि कोई व्यक्ति इस समय का सही इस्तेमाल कर ले, तो उसका जीवन नई दिशा पा सकता है।
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