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Maharajganj News: मरीजों को निजी अस्पताल भेज मालामाल हो रहे झोलाछाप

Mon, 17 Mar 2025 12:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
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जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर के पास गोरखपुर के नंबर की खड़ा टेंपो।
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महराजगंज। मरीज माफिया का जाल शहर से नेपाल तक फैला है। दलालों का नेटवर्क इतना गहरा है कि इसे कोई समझ नहीं पाता है। इसमें झोलाछाप को भी शामिल किया गया है। प्राथमिक स्तर पर यही सेटिंग मरीज को निजी अस्पताल तक जाने का रास्ता बनाता है। नेटवर्क में शामिल सभी का हिसाब साप्ताहिक व मासिक होता है।
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मरीज को भर्ती करने के खेल में छोटे से लेकर बड़े अस्पताल शामिल हैं। ज्यादातर मामलों में शिकायत न होने के कारण यह धंधा-धड़ल्ले से चल रहा है। इस पूरे खेल को समझने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र का रुख करना पड़ा। झुलनीपुर के पास एक झोपड़ी में झोलाछाप मिला। उसके पास चार महिलाएं बैठी थीं। वह बड़ी-बड़ी बातें करने में मशगूल था। उसके पास एक बीमार महिला सलाह लेने आई थी। उसे सीने में दर्द हो रहा था। उसने झोले से निकालकर दवा देने के साथ ही गोरखपुर के एक निजी अस्पताल का नाम बताया। उसने मोबाइल से तुरंत निजी अस्पताल में बात की। उसके खेल को वहां कोई समझ नहीं सका। महिला उसकी बातों पर भरोसा कर चली गई।
सूत्रों की माने तो झोलाछाप की साठगांठ बड़े से लेकर छोटे अस्पतालों तक है। बीमारी में जितनी रकम खर्च होती है, उसी हिसाब से मोटा कमीशन भी दिया जाता है। एक झोलाछाप की एक माह की औसतन कमाई करीब 30 से 40 हजार रुपये है। इसमें उनका कुछ भी नहीं लगता है। केस खराब होने के बाद उन पर कोई आरोप भी नहीं लग पाता है। शितलापुर के नरेश यादव ने बताया कि झोलाछाप आसानी से अपनी बातों में फंसा लेता है। अपने चहेते अस्पताल में भेजकर मोटी रकम हासिल करते हैं। सूत्रों की माने तो नेपाल से आने वाले मरीजों के नाम पर बड़ा खेल होता है। कुछ अस्पतालों के एजेंट नेपाल में हर माह दौरा कर वहां डॉक्टरों से संपर्क करते हैं। वहां झोलाछाप से लेकर डिग्री वाले डॉक्टरों से हर स्तर से बातचीत की जाती है। प्रति मरीज के एवज में कम से कम दो से पांच हजार की रकम निर्धारित होती है। सामान्य बीमारी होने पर भी मरीज अगर निजी अस्पताल पहुंच गया तो जांच व दवा के नाम पर 12 से 13 हजार खर्च करने पड़ते हैं। इसमें भेजने वाले दलाल का कमीशन भी होता है। इस पूरे खेल को कोई मरीज समझ नहीं पाता है। सब कुछ इतनी सफाई से होता है कि जब तक खेल समझ में आता है, तब तक जेब खाली हो जाती है। एक सप्ताह पहले नेपाल के बर्धघाट से एक मरीज शहर के निजी अस्पताल में पथरी का ऑपरेशन कराने आया था। उसे नवलपरासी के एक झोलाछाप ने भेजा था। नेपाल से आने वाले मरीज ने महराजगंज शहर के एक अस्पताल में इलाज कराया तो उसे करीब 25 हजार खर्च करने पड़े। इसके अलावा दवा पर भी रकम खर्च करनी पड़ी।
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सूत्र बताते हैं कि मरीज को नेपाल से चलते ही संबंधित अस्पताल में फोन आ जाता है। इसके बाद संबंधित दलाल के खाते में मरीज का नाम दर्ज हो जाता है। माह भर में मोटी रकम कमीशन के एवज में बन जाती है। खास बात यह है कि अस्पताल तक पहुंचाने के लिए दलाल वाहन की व्यवस्था कर स्वयं ही लेकर बड़े केस में पहुंचते हैं। महराजगंज ही नहीं गोरखपुर के बड़े अस्पतालों तक इनकी दखल होती है। इनके जाल में सबसे अधिक कम पढ़े-लिखे लोग ही फंसते हैं।
जिला अस्पताल के सामने से हटी एंबुलेंस : जिला अस्पताल के सामने से बीते दिन खड़ी एंबुलेंस रविवार को नजर नहीं आई। इसके आसपास कोई अन्य वाहन भी नजर नहीं आया। बताया जा रहा है कि अस्पताल प्रशासन इस मसले पर सख्त हो गया है। सीसीटीवी कैमरे से निगरानी तेज कर दी गई है। अस्पताल में अनावश्यक घूमने वालों से पूछताछ की जाएगी। सूत्रों की माने तो मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाने वाले ज्यादातर ऑटो रिक्शा शामिल हैं।
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