विशुनपुर गबड़ुआ पर बना शहीद स्मारक।
महराजगंज। जनपद का विशुनपुर गबड़ुआ गांव फिरंगियों की बबर्रता का साक्षी रहा है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान शहीद हुए गांव के लोगों को याद करके यहां के लोग आज भी गौरवान्वित होते हैं। 1942 के आंदोलन को कुचलने पहुंचे ब्रिटिश सेैनिकों के आगे सभी ग्रामीण सीना तानकर खड़े हो गए थे। गोलीबारी में सुखराज और झिनकू नाम के दो जवानों के शहीद होने और करीब एक दर्जन लोगों को जेल भेजने के बाद भी लोगों ने झुकने से इंकार कर दिया।
इस बर्बरता के बाद भी आजादी के परवानों ने हार नहीं मानी, और वीरता की ऐसी दास्तां लिखी कि देश के आजादी के 49 साल बाद भी लोग इनकी शहादत को नमन करते हैं। साहित्यकार डॉ. परशुराम गुप्ता अपनी पुस्तक ‘पूर्वांचल के गांधी प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना’ में लिखते हैं कि साल 1942 में 8 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद इसे आगे बढ़ाने के लिए प्रो. सक्सेना ने जनजागरण के लिए गांव-गांव में जाकर टोलियों का गठन किया। विशुनपुर गबड़ुआ के लोगों के उत्साह को देखते हुए उन्होंने गांव के काशीनाथ मिश्र को तहसील स्तरीय मंत्री व रामदेव को गांव की टोली का नायक बना दिया था। गांव-गांव घूम घूमकर वे अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की सशक्त बुनियाद रख रहे थे। वहीं अंग्रेजी सरकार प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना को पकड़ने के लिए जी-जान से जुटी हुई थी।
इसी बीच 26 अगस्त 1942 की रात में प्रो. सक्सेना के विशुनपुर गबड़ुआ जाकर मीटिंग करने की सूचना अंग्रेजों को हुई। इसकी खबर अंग्रेज समर्थक रईस गिरी के जरिए कलेक्टर ईडीबी मास को मिली तो अंग्रेजी पुलिस ने समर्थक जमींदारों की मदद से विशुनपुर बगड़ुआ गांव की घेराबंदी कर दी। इसकी भनक लगते ही प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना मीटिंग करने के बाद कुछ क्रांतिकारी साथियों के साथ ब्रिटिश पुलिस के आने से पहले ही निकल गए।