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Maharajganj News: जुगाड़ से बन गया लाइसेंस, मेडिकल स्टोर का पता नहीं

Mon, 28 Apr 2025 01:10 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
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महराजगंज। मेडिकल स्टोर के संचालन में हर कदम पर झोल है। नियम-कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। जुगाड़ से लाइसेंस बनवाकर रख लिए, लेकिन दुकान कहां है किसी को पता नहीं है। ऐसे करीब 10 फीसदी लाइसेंस हैं।
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वहीं दूसरी ओर लाइसेंस पर जहां की चौहद्दी दर्ज है, उस निर्धारित स्थान पर दुकान नहीं है। ज्यादातर जगहों पर ऐसे मेडिकल स्टोर संचालित हैं, जहां बकायदा मरीजों का इलाज किया जाता है। केमिस्ट अनुभव के आधार पर इलाज कर मोटी रकम लेते हैं। सूत्रों की माने तो जिले में ऐसे मेडिकल स्टोरों पर जिम्मेदारों की नजर नहीं है।
कुछ स्थानों पर तो ऐसी दुकानें संचालित हैं, जिनके मकान मालिक ने कमरा खाली करा दिया और दूसरी जगह दुकान शिफ्ट हो गईं। इस पर किसी की नजर नहीं है, जिम्मेदार लाइसेंस देखकर किनारा कस लेते हैं।
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जानकार बताते हैं कि नियम के अनुसार जहां दुकान संचालित हो रही हैं, अगर वहां से कहीं शिफ्ट हुई है तो विभाग को सूचित करते हुए उसकी चौहद्दी से लेकर अन्य जरूरी जानकारी लाइसेंस जारी होने वाले प्रपत्र में दर्ज होना चाहिए। एक अनुमान के अनुसार, 100 से अधिक मेडिकल स्टोर होंगे जिनके स्थान बदलकर नए स्थानों पर दुकान संचालित किए जा रहे हैं।
दवा विक्रेता संगठन के कुछ नेताओं की दुकानें हैं, जो दूसरी जगह शिफ्ट हो गई हैं, लेकिन विभाग के अधिकारी को पता नहीं है। संगठन में सक्रिय भागीदारी दिखाकर अपनी खामियों को कथित नेता छिपाकर काम कर रहे हैं।
दुकान का लाइसेंस लेकर काम करने में अन्य नियम एवं शर्तों का पालन करना भूल जा रहे हैं। संगठन के कुछ कथित नेता बगैर लाइसेंस के दुकान संचालित कर रहे हैं।
अधिकतर दुकानें लंबे समय से नौसिखियों के भरोसे चल रही
सूत्रों की माने तो जिले भर में चल रहे मेडिकल स्टोर्स में अधिकतर दुकानें लंबे समय से नौसिखियों के भरोसे चल रही हैं। इन दुकानों पर टंगे लाइसेंस किसी और के नाम से हैं, जबकि यहां दवाओं की बिक्री किसी और के भरोसे की जा रही हैं। हालात यह है कि मेडिकल स्टोर्स संचालकों को आसानी से किराए पर फार्मासिस्ट मिल जाते हैं। इसके बाद इन्हीं लाइसेंस के आधार पर इन दवा की दुकानों का संचालन अन्य व्यक्ति कर रहे हैं। ऐसे में यह नौसिखिए आमजन के स्वास्थ्य को खतरे में भी डाल सकते हैं। किसी भी मेडिकल स्टोर पर दवाओं की बिक्री करने के लिए खुद फार्मासिस्ट का होना जरूरी है, लेकिन हालात यह है कि अधिकतर दुकानों पर नौसिखिए ही दवाएं बेच रहे हैं। कुछ दिन काम सीखने के बाद वह भी किराए के लाइसेंस पर दुकान का पंजीयन करवा लेते हैं और किसी और कि डिग्री के आधार पर ही दुकान का संचालन शुरू कर लेते हैं। जुगाड़ के फार्मासिस्ट से दवा बेचकर मुनाफा कमाने वालों की संख्या अधिक है, लेकिन इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है। औषधि निरीक्षक कभी कभार मेडिकल स्टोर पर जांच पड़ताल करने पहुंच जाते हैं और बिना कार्रवाई किए ही लौट जाते हैं।
केवल चालान जमा कर संचालित हो रहीं पुरानी दुकानें

सूत्रों की माने तो जिले भर में शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में करीब 3000 से अधिक लाइसेंसी मेडिकल स्टोर संचालित हो रही हैं। इसमें से 60 फीसदी से अधिक पुरानी दुकानें बिना फार्मासिस्ट के केवल चालान जमा कर संचालित हो रही हैं। ऐसे में डिग्री होल्डर के लाइसेंस किराए पर लेकर दुकानें संचालित की जाती हैं। इसके लिए दवा विक्रेता लाइसेंसी को घर बैठे ही मासिक चार से पांच हजार रुपये बतौर किराये के रूप में मिल जाते हैं। जिले में संचालित अधिकांश मेडिकल स्टोर संचालक ग्राहकों को पक्का बिल नहीं देते हैं। किसी के पास कंप्यूटर नहीं है तो किसी के पास बिल बुक नहीं रहता है। ग्राहक के मांगने पर पहले तो टहलाया जाता है। जब नहीं मानता है तो दवा के कागज के लिफाफे पर ही कीमत लिख दी जाती है।
नशीली दवाओं की बिक्री का खेल भी खूब चलता
अवैध रूप से संचालित दुकानों पर प्रतिबंधित (नशीली) दवाओं की बिक्री का खेल भी खूब चलता है। सीमावर्ती क्षेत्र में मेडिकल स्टोर संचालक चिकित्सक के परामर्श पर मिलने वाली दवाएं भी लोगों को बेरोक टोक बेचते हैं। इसके बदले ग्राहकों से मुंहमांगी कीमत वसूल की जाती है। ये मेडिकल संचालक खुद ही चिकित्सक बनकर लोगों को महंगी दवा देकर उन्हें बेवकूफ बनाने से भी नहीं चूकते। मरीज को लेकर परेशान लोग मजबूरी में बेइज्जत होने के बाद भी इन मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने को मजबूर होते हैं।
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