लेप्रोस्कोपिक विधि से सर्जरी शुरू होने के बाद मरीजों की बढ़ने लगी तादाद
गॉलब्लैडर व अपेंडिक्स के मरीजों की संख्या में तेजी से हो रहा इजाफा
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल काॅलेज में पिछले 10 दिनों से लेप्रोस्कोपिक विधि से सर्जरी शुरू होने के बाद मरीजों को राहत मिलने लगी है। इससे अब तक लगभग 15 मरीजों ने इस विधि से सफल सर्जरी भी करवाई है। इसके अलावा अन्य मरीज भी इससे सर्जरी के लिए चिकित्सकों से समय ले रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज में अभी लेप्रोस्कोपिक विधि से गॉल ब्लैडर और अपेंडिक्स से पीड़ित मरीजों का ऑपरेशन किया जा रहा है। इससे इनकी संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। पहले जहां ऐसे मरीजों को बड़े ऑपरेशन और लंबी रिकवरी का सामना करना पड़ता था, वहीं अब छोटे चीरे के माध्यम से सर्जरी होने से उन्हें कम दर्द और कम समय में राहत मिल रही है। लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में पेट पर केवल छोटे-छोटे चीरे लगाए जाते हैं, जिनके जरियये कैमरे और विशेष उपकरणों की सहायता से ऑपरेशन किया जाता है। इससे न केवल ऑपरेशन के दौरान रक्तस्राव कम होता है बल्कि संक्रमण की आशंका भी काफी कम हो जाती है। इसके अलावा मरीज को लंबे समय तक बेड रेस्ट से भी राहत मिल रही है।
सुरक्षित और कम समय में छुटकारा
सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सीबी पांडेय ने बताया कि लेप्रोस्कोपिक सर्जरी वर्तमान समय में इलाज का सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। इसमें मरीज को कम दर्द होता है। टांके बहुत छोटे होते हैं और रिकवरी भी तेज होती है। गॉल ब्लैडर और अपेंडिक्स जैसे मामलों में यह विधि बेहद कारगर है। बताया कि लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के बाद अधिकतर मरीज 24 से 48 घंटे के भीतर चलने-फिरने लगते हैं, जबकि पारंपरिक सर्जरी में उन्हें कई दिनों तक आराम करना पड़ता है।
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वर्जन
लेप्रोस्कोपिक सर्जरी का दायरा और बढ़ेगा। इससे जिले के मरीजों को बाहर बड़े शहरों में इलाज के लिए भटकना नहीं पड़ेगा। इससे न केवल समय और खर्च की बचत होगी बल्कि स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध होंगी। मरीजों की सहूलियत के लिए जल्द ही अन्य सर्जरी भी शुरू की जाएगी।
- प्रो. राजेश मोहन, प्राचार्य