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मेंथा की खेती की ओर बढ़ा किसानो का झुकाव, दोगुना हुआ रकबा

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मेंथा की खेती की ओर बढ़ा किसानों का रुझान, दोगुना हुआ रकबा
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जिले के चार ब्लॉकों में वर्ष 2014 से शुरुआत हुई थी पिपरमेंट की खेती
कम लागत में किसानों को ज्यादा होता है मुनाफा
निचलौल (महराजगंज )। किसानों का मेंथा (पिपरमेंट) की खेती की ओर लगातार रुझान बढ़ रहा है। यही कारण है कि शुरुआती दौर से अब तक इसका रकबा बढ़कर दोगुना हो चुका है। एक हेक्टेयर में किसानों को लागत छोड़ तकरीबन 70 से 80 हजार रुपये का मुनाफा होता है। किसानों का मानना है कि यह खेती अन्य की तुलना में काफी फायदेमंद है।
कृषि विज्ञान केंद्र बसूली के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विनोद बहादुर सिंह के मुताबिक वर्ष 2014 में जिले के सिसवां, निचलौल, घुघली और मिठौरा विकास खंड में 65 से 70 हेक्टेयर के भूमि पर मेंथा की खेती की शुरुआत की गई थी। वर्तमान में इसका रकबा धानी, बृजमनगंज और नौतनवां विकास खंड क्षेत्र में बढ़कर करीब 122 हेक्टेयर हो चुकी है। उन्होंने बताया कि एक हेक्टेयर में मेंथा की खेती लगाने में तकरीबन 20 से 25 हजार रुपये का खर्च लगाता है। जबकि इसमें से निकले वाली मेंथा की कीमत करीब 90 से एक लाख रुपये तक होती है। कम लागत में मेंथा की खेती करने वाले किसानों को आसानी से बड़े पैमाने पर मुनाफा हो जाती है। यही कारण है कि मेंथा की खेती की रकबा तेजी के साथ बढ़ रही है।
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मेंथा की खेती के लिए जनवरी में इसकी नर्सरी को तैयार किया जाता है। नर्सरी के डेढ़ महीने बाद खेतों में सिंचाई कर 45 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधों की रोपाई की जाती है। रोपाई के 90 से 100 दिन के अंदर मेंथा की पहली फसल पक कर तैयार हो जाती है। वहीं, दूसरी फसल 80 से 90 दिन के अंदर पक जाती है। इस फसल को एक बार लगाने के बाद दो बार भी काटा जा सकता है। लेकिन मौसम अनुकूल नहीं होने के चलते ज्यादातर किसान मेंथा की फसल की एक बार की कटाई करने के बाद धान की रोपाई शुरू कर देते हैं।
किसानों को दिया जाता है प्रशिक्षण
प्रमुख फसलों के साथ मेंथा की खेती के लिए भी कृषि विज्ञान केंद्र बसूली द्वारा किसानों को समय- समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र बसूली के वैज्ञानिक डॉ. विजय चंद्रन ने बताया कि हर रोज सुबह दस बजे से दोपहर दो बजे तक विज्ञान केंद्र पर पहुंचने वाले सभी किसानों को नि:शुल्क प्रशिक्षण एवं सलाह दी जाती है। जिले की प्रमुख फसलों के मुकाबले मेंथा की खेती में कम लागत और ज्यादा मुनाफा के चलते रकबा में बढ़ोत्तरी हो रही है।
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छुट्टा पशु नहीं करते नुकसान, गांव आते हैं व्यापारी
निचलौल क्षेत्र के खोन्हौली गांव निवासी किसान हृदेश कसौधन ने बताया कि मेंथा की खेती को छुट्टा पशु नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। छुट्टा पशु मेंथा की महक से वापस लौट जाते हैं जिससे इनसे फसल सुरक्षित रहती है। वहीं, किसान कलामुद्दीन अंसारी का कहना है कि पहले मेंथा ऑयल को बेचने के लिए शहर में व्यापारियों की दुकान पर जाना पड़ता था। लेकिन रकबा बढ़ने के बाद अब व्यापारी गांव आकर मेंथा की खरीदारी करते हैं।
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