संभावना तलाशने तमिलनाडु गई टीम, गो आधारित खेती से बदला जलवायु प्रभाव
सेब, काजू, बादाम, नारियल जैसे पौधों को स्थानीय क्षेत्र में उगा रहे हैं नवरत्न
महराजगंज। सिसवा बाजार के नवरत्न के प्रयोगों के सार्थक परिणाम ने कृषि क्षेत्र में नई संभावनाओं को विस्तार दिया है। नवरत्न के प्रयास से गो आधारित खेती से ऐसी फसल भी कहीं उगाई जा सकती हैं जिसे आज तक क्षेत्र विशेष का दर्जा प्राप्त है। इसमें सेब, काजू, बादाम, नारियल जैसे नाम हैं जो आम तौर पर ठंडे प्रदेशों या समुद्री तटों पर पाए जाते हैं।
यह पौधे नवरत्न के फाॅर्म में पूरी तेजी से विकसित हो रहे हैं। इस परिवर्तन ने कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों को मजबूर किया कि वह उन क्षेत्रों में संभावना तलाशने गए हैं जहां इनके उत्पादन की बाहुल्यता। बंसुली कृषि विज्ञान केंद्र के डीपी सिंह के नेतृत्व में दो कृषि विज्ञानियों की टीम इन दिनों तमिलनाडु के काजू बागान की आबोहवा परख रही है।
सिसवां नगर पालिका निवासी नवरत्न तिवारी ने पांच वर्ष पूर्व सिसवां जैसे क्षेत्र में एक गाय के सहारे गो आधारित कृषि की नींव रखी थी। आज उनके पांच हेक्टेयर के कृषि फार्म में ऐसे पौधे तेजी से फल-फूल रहे हैं जिन्हें विशिष्ट जलवायु में उत्पादन के लिए जाना जाता है। कश्मीर व हिमाचल जैसे प्रदेशों में पैदा होने वाला सेब हों अथवा केरल व तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में उगने वाले काजू-बादाम के पौधे। यहां तेजी से विकसित हो रहे हैं।
अभी यह उत्पादन भले नहीं दे रहे लेकिन कृषि वैज्ञानिकों को यह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या ऐसी फसल भी जनपद की जलवायु में उगाई जा सकती जो क्षेत्रवार उत्पादन के लिए विख्यात है।
एक गाय से शुरू प्रयास बढ़ता गया गोवंश कारवां
नवरत्न ने एक गोवंश के सहारे गोवंश आधारित खेती कोविड काल में शुरू की थी। आज उनके पास कुल 17 गोवंश हैं। जिसमें 5 उन्हीं के फार्म हाउस पर हैं तो शेष आसपास के किसान दूध के लिए अपने यहां सेवा करने ले गए हैं। नवरत्न ने गोवंश किसानों को जरूर सौंपा है लेकिन किसान गोवंश के गोबर व गोमूत्र नियमित उनके फार्म पर पहुंचाते हैं। इस गोबर का उपयोग जैविक खेती के लिए तो गोमूत्र का उपयोग वह कीटनाशक के रूप में करते हुए बिना रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक के आर्गेनिक मटर, टमाटर, हल्दी, केला, लोबिया और तरह-तरह के फल का उत्पादन कर रहे हैं।
गोबर से बनती धूपबत्ती, आगे पेंट्स व ईंट भी उतारने की तैयारी
नवरत्न ने बिना किसी प्रशिक्षण बीएससी पढ़ाई के बाद गो आधारित खेती शुरू की लेकिन राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र गाजियाबाद से तीन माह का प्रशिक्षण लेकर गाय गोबर से गो काष्ठ, ईंट व गोमूत्र व गोबर से बनने वाले पेंट्स व वाल पुट्टी बनाने की तैयारी में जुटे हैं। इस पुट्टी व ईंट की खासियत यह कि यह एक तरह से तापमान नियंत्रक की तरह कार्य करेगी। इससे बने घर या पुट्टी लेपित घर सर्दियों में गर्म व लू के थपेड़ों के बीच ठंडे रहेंगे।
10 हजार रुपये प्रतिमाह की दी नौकरी
नवरत्न तिवारी ने अपने फार्म में 5 क्षेत्रीय युवाओं को 10 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी भी दे रखी। यह युवा फार्म के कार्य में उनका हाथ बंटाते हैं। इनका वेतन आर्गेनिक खेती के उत्पाद की बिक्री से किया जाता है। वह इस उपलब्धि पर राज्य व केंद्र स्तर के कार्यक्रमों में सम्मान पा चुके हैं।
गोवंश आधारित खेती का संकल्प बनाया ध्येय
नवरत्न तिवारी ने बताया कि उनका उद्देश्य गो आधारित खेती बढ़ाना है। इसमें सफलता मिल रही है। ऐसे पौधे तेजी से विकसित हो रहे हैं जो क्षेत्र विशेष के लिए जाने जाते हैं। पहले यह अगर दूसरे क्षेत्र में पाली हाउस में ही उगाए जा सकते थे लेकिन गो आधारित खेती में वह शक्ति कि मिट्टी को हर जलवायु के पौधे के लिए अनुकूल कर देती।
नवरत्न को मिले सम्मान
नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय से प्रगतिशील किसान सम्मान। अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन की तरफ से ग्लोबल फार्मिंग सम्मान व डाक्यूमेंट्री निर्माण, प्रदेश गो सेवा आयोग अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता से नंदी पुरस्कार, पूर्वांचल किसान उन्नयन संगठन की तरफ से क्षेत्रीय अध्यक्ष का दर्जा। भारतीय मौसम विज्ञान केंद्र की तरफ से क्लाइमेट चेंजर विद् फार्मिंग सम्मान। यह सभी सम्मान 2022 से 2025 के मध्य दिए गए।
वर्जन
सिसवां के किसान ने पारंपरिक खेती से इतर नवाचार के साथ खेती को मुनाफे का कारोबार बनाकर दिखाया है। उन्हें कई पुरस्कार मिल चुके हैं। प्राकृतिक खेती के लिए वह ब्रांड एंबेसडर से कम नहीं।
-शैलेंद्र प्रताप सिंह, डीएओ, महराजगंज।
सिसवां के नवरत्न ने गो आधारित कृषि से जलवायु को परे रखकर ऐसे पौधे उगाए जो दूसरे क्षेत्रों में अब तक असंभव थे। उनके फार्म का निरीक्षण कर हमारे साथ के डॉ. युवराज व डॉ. मनीष भी काजू उत्पादन की संभावनाओं की पड़ताल के लिए तमिलनाडु गए हैं। हमें उत्साहित करने वाले परिणाम दिख रहे हैं। निश्चित तौर पर गो आधारित खेती से जलवायु प्रभाव कारक हटाकर किसानों को धान व गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की जगह अधिक आय देने वाली फसल से जोड़ा जा सकेगा।
-डाॅ. डीपी सिंह, निदेशक कृषि विज्ञान केंद्र, बंसुली, महराजगंज