महराजगंज। जनपद में जिस गति से दलहन की खेती का रकबा घटा उसी दर से गैर राज्यों की दाल पर जनपदवासियों की निर्भरता बढ़ती गई। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की पालिस वाली मिलावटी दाल खाना लोगों की मजबूरी बन गई है। इसका फायदा कम नुकसान अधिक बताया जा रहा है।
जनपद में 2018 से पहले दलहन का रकबा 35 से 40 हजार हेक्टेयर था। इससे पहले के वर्षों में शायद ही जिले का कोई ऐसा गांव था जहां दलहन का उत्पादन न होता हो, लेकिन महज आठ वर्ष में ही स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जनपदवासियों की जुबान पर अखरा अरहर (बड़े दाल की प्रजाति) का स्वाद चढ़ा था, जब वह अपने खेतों में दलहनी फसल के रूप में चना, मटर, मसूर व अरहर की खेती करते थे।
शुरुआत में गैर राज्यों की दाल बेस्वाद जरूर लगी, लेकिन अब आदत हो गई है। किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष राम अशीष बताते हैं कि पहले जो किसान अरहर उत्पादन नहीं करते थे वह मटर, चना या मसूर जरूर उगाते थे, जिसकी बिक्री के बाद स्थानीय अरहर खरीदकर खाने की व्यवस्था कर लेते थे, लेकिन जबसे उत्पादन से दूर हुए बाहर से आने वाली दाल पर ही निर्भर होते गए।
पोखरभिंडा के पूर्व प्रधान व बड़े किसान अनिरुद्ध चौधरी ने कहा कि बेसहारा पशुओं का आतंक दलहन से दूरी का प्रमुख कारण बना। अधिक मेहनत और लागत के बाद भी पशु फसल तबाह करते थे। जंगल से निकटता से शाही, नीलगाय, जंगली सुअर से भी मुकाबला करना पड़ता था। पहले बेसहारा पशुओं के लिए गोशाला सुविधा भी नहीं मिलती थी, जिसके कारण दलहन उत्पादन जनपदीय किसान कम करते गए।
10 वर्ष पहले दलहन का रकबा अधिक होने की बात प्रमाणिक है। उत्पादन, रखवाली, मेहनत अधिक लगने से दायरा घटा है, लेकिन विभाग दायरा बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। इस बार मूंग और उड़द का बीज किट निशुल्क देकर किसानों को प्रेरित किया गया, जिससे इस बार दलहन का रकबा 25 हजार हेक्टेयर तक पहुंच सका। पिछले वर्ष रकबा और कम था।
-वीरेंद्र कुमार सिंह, उप कृषि निदेशक