बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीले पर पुरातत्व विभाग की मुहर
टीले के शिवलिंग की कार्बन डेटिंग में 11वीं शताब्दी का सिद्ध हुआ
नीलोत्पल दुबे
महराजगंज। जनपद के हिस्से में एक और उपलब्धि जुड़ गई है। अब तक सिर्फ इसे बुद्ध से जुड़ा जनपद माना जाता था लेकिन अब यहां कुषाण काल के भी साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्व विभाग की जांच में खड़खोड़ा टीला 11वीं शताब्दी का सिद्ध हुआ है। विभाग अब टीले का सीमांकन कराकर इसे अपने संरक्षण में लेने की प्रक्रिया शुरू करेगा।
बृजमनगंज का सहजनवा बाबू गांव घोघी नदी के तट पर है। गांव में आबादी से दूर लगभग दो एकड़ भूभाग में एक बड़ा टीला है, इसे खड़खोड़ा टीले के नाम से जाना जाता है। इस टीले पर कुल पांच शिवलिंग हैं। क्षेत्रीय लोगों के मुताबिक, यह टीला पांडवकालीन माना जाता है। टीले पर पांच की संख्या में शिवलिंग होना व पांडव की संख्या भी पांच होना इस जनश्रुति को अबतक मजबूती दे रहा था लेकिन अब पुरातत्व विभाग ने इसे कुषाण कालीन बताकर संरक्षित करने के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। अब इस टीले की जमीन को पुरातत्व विभाग अपने अधिकार क्षेत्र में लेगा और 200 मीटर दायरे में किसी भी व्यक्ति को निर्माण कराने के लिए पुरातत्व विभाग से अनुमति लेनी पड़ेगी।
11 वीं शताब्दी के हैं शिवलिंग
खड़खोड़ा टीले की ऐतिहासिकता को साबित करने के लिए अगस्त 2025 में प्रदेश पुरातत्व निदेशक रेनू द्विवेदी व प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी राम विनय के निर्देश पर खड़खोड़ा टीले के निकट उत्खनन कराया गया था। साथ ही टीले के शिवलिंग की कार्बन डेटिंग कराई गई थी। अब पुरातत्व विभाग ने इस स्थान की ऐतिहासिकता को साबित कर दिया है। टीले के शिवलिंग कार्बन आयु गणना में 11वीं शताब्दी के मिले हैं। साधारण तौर पर समझने के लिए इसे मिर्जापुर के चुनार किले का समकक्ष माना जा सकता है क्योंकि चुनार किला इसी शताब्दी में निर्मित है।
सहजनवां बाबू के मंजेश सिंह व सुनील सिंह ने बताया कि हम लोग के बाप दादा यही बताते थे कि यह टीला बहुत प्राचीन है। अब पुरातत्व विभाग के उत्खनन से यह साबित हो गया है। टीला संरक्षित होगा तो यहां पर्यटक आएंगे और हमारा गांव ख्यातिलब्ध होगा।
जिला प्रशासन के सहयोग कर से होगा सीमांकन
प्रभारी क्षेत्रीय उत्खनन अधिकारी राम विनय ने बताया कि पुरातत्व निदेशक स्तर से निर्देश लेकर जिला प्रशासन से संपर्क कर उक्त ऐतिहासिक महत्व के टीले का सीमांकन कराकर विभाग इसे अपने कब्जे में लेने की प्रक्रिया शुरू करेगा। संरक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद टीले के 200 मीटर के दायरे में किसी तरह का निर्माण प्रतिबंधित रहेगा। 500 मीटर की दूरी पर भी निर्माण कराने के लिए विभाग से मंजूरी अनिवार्य होगी।
वर्जन
खड़खोड़ा टीले के पास उत्खनन मेरे निर्देशन में हुआ था। यहां कुछ मृदभांड व शिवलिंगों की कार्बन डेटिंग कराई गई थी। परीक्षण परिणाम में शिवलिंग 11वीं शताब्दी का सिद्ध हुआ वहीं मृदभांड कुषाण काल का साबित हुआ। पुरातत्व निदेशालय की तरफ से जारी 40 पुरातत्व महत्व के स्थानों में खड़खोड़ा कुषाणकालीन सिद्ध हुआ।
-कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी, गोरखपुर
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शासन की तरफ से ऐतिहासिक महत्व के स्थानों को संरक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में खड़खोड़ा टीला ऐतिहासिक साबित हुआ है। पुरातत्व विभाग जो संरक्षण के लिए सभी तरह का सहयोग प्रशासन की तरफ से दिया जाएगा।
-महेंद्र कुमार सिंह, सीडीओ, महराजगंज