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Maharajganj News: सौ साल पुरानी सिसवा बाजार की ऐतिहासिक रामलीला को अब मिला भव्य रूप

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सिसवा बाजार। नगर की ऐतिहासिक रामलीला ब्रिटिश काल से चली आ रही 100 वर्ष से भी अधिक पुरानी सांस्कृतिक धरोहर है। करीब 30 वर्ष बाद स्थानीय युवाओं ने इस सनातन परंपरा को आधुनिक और भव्य रूप दिया है।
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इस प्राचीन पहचान का मंचन हर वर्ष विजयादशमी के दिन से नगर के एस्टेट चौक स्थित प्राइमरी पाठशाला के मैदान में होता रहा। स्थानीय राजनीति और उपेक्षा के कारण 1986 के बाद यह परंपरा लड़खड़ाने लगी। साल 1993 आते-आते इस गौरवशाली मेले का पटाक्षेप हो गया था। नगर के कुछ उत्साही युवाओं ने 2023 में कमानी धर्मशाला से इसे फिर से शुरू किया है।
इस रामलीला की नींव सिसवा के संभ्रांत नागरिकों, बुजुर्गों और सनातन धर्म प्रेमियों की संयुक्त समिति ने रखी थी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि सभी पात्र सिसवा के ही आम नागरिक होते थे। कस्बे के युवा, शिक्षक, कपड़ा व्यापारी और किसान बिना किसी व्यावसायिक लाभ के अभिनय करते थे। राम, लक्ष्मण, सीता, भरत-शत्रुघ्न जैसे मुख्य पात्रों के लिए अविवाहित, किशोर बालकों का चयन होता था। ये बालक कुलीन ब्राह्मण परिवार से आते थे।
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मंचन के दौरान इन बच्चों को साक्षात ‘स्वरूप’ मानकर पूजा जाता था। रावण, कुंभकर्ण और राजा जनक जैसी भूमिकाओं के लिए दमदार आवाज वाले वरिष्ठ बुजुर्गों को चुना जाता था। मंच के पीछे से व्यास और रामायण मंडली रामचरितमानस की चौपाइयां गाती थी। कलाकार बिना लाउडस्पीकर के अपनी बुलंद आवाज में संवाद बोलते थे। उस दौर में सिंथेटिक रंग नहीं होते थे। खड़िया, रामरज, सिंदूर और जड़ी-बूटियों से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता था।
10 दिनों तक रामलीला के प्रसंगों के मंचन के बाद अंतिम दिन रावण दहन होता था। उस समय 25 से 35 फुट ऊंचा रावण का पुतला बिना किसी क्रेन के खड़ा किया जाता था। यह पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल होता था। इसका ढांचा बांस की खपच्चियों और लोहे के पतले तारों से बनता था। इस पर पुरानी सूती साड़ियों, आटे की लेई और रंगीन कागज चिपकाए जाते थे।
10 सिरों के मुखौटे मिट्टी और कागजी लुगदी से बनते थे। दहन के लिए इलेक्ट्रॉनिक आतिशबाजी नहीं, बल्कि स्थानीय आतिशबाजों द्वारा बनाए गए देसी गोले और अनार पुतले में फिट किए जाते थे। जैसे ही राम का तीर रावण की नाभि पर लगता, रंग-बिरंगी चिंगारियां छूटती थीं।
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