महराजगंज। जिले का निचलौल तहसील उत्सवों के उत्साह को लेकर खास तौर पर जाना जाता है। दुर्गा पूजा उत्सव को लेकर जनपद का सिसवां बाजार जहां भव्य आकर्षक पांडाल और विशाल प्रतिमाओं के लिए जाना जाता है, वहीं निचलौल का बरगदवां वार्ड तीन दशक पुराने अपनी रामलीला को लेकर जाना जाता रहा है। लेकिन 32 साल पुरानी बरगदवां की यह रामलीला इस बार कलाकारों के अभाव में नहीं हो रही है। इन 32 वर्षों में ऐसा पहली बार हो रहा है कि नवरात्र में बरगदवा में चहल-पहल नहीं है। हालांकि दुर्गापूजा का आयोजन हो रहा है। पंडाल तेजी से बन रहे हैं लेकिन रामलीला का मंचन नहीं हो रहा है।
बृहस्पतिवार को बरदगवां वार्ड में दुर्गा पूजा उत्सव की तैयारी जोरों पर चल रही थी। वार्ड के निवर्तमान सभासद जयसिंह यादव व धर्मेंद्र यादव दुर्गा प्रतिमा को आज शाम पंडाल में प्रतिष्ठापित करने के लिए वार्ड के कुछ अन्य लोगों से चर्चा कर रहे थे। उनसे वहां होने वाले रामलीला के बारे में जब बात की गई तो निराशा भरे भाव से निवर्तमान सभासद जयसिंह ने बताया कि कलाकारों के अभाव में 32 साल पुरानी रामलीला की यह परंपरा इस बार टूट गई। इसका अफसोस है, लेकिन दुर्गा पूजा का उत्सव उसी उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस बीच करीब तीन दशक पुराने रामलीला की चर्चा सुन कर कुछ दूरी पर खडे़ रामलीला में राम का किरदार निभाने वाले शैलेश पांडेय बोल पडे़ कि पूरे वार्ड के लोगों को इसका मलाल है कि इस बार यहां रामलीला नहीं हो रही। बरगदवा में रामलीला को शुरू कराने वाले अवकाश प्राप्त शिक्षक 69 वर्षीय रामाज्ञा पटेल की आंखें रामालीला का जिक्र होते ही चमक उठीं। बड़े उत्साह से उन्होंने बताया कि आज से करीब 32 साल पहले 1985 में यहां रामलीला शुरू की गई थी। उस समय के बहुत से साथी और कलाकार आज दुनिया में नहीं हैं लेकिन यह परंपरा चलती रही। लेकिन अफसोस है कि जिस परंपरा को उन लोगों ने शुरू किया, उसे नई पीढ़ी संभाल नहीं पाई। रामाज्ञा बताते हैं कि रामलीला में गांव के लोग ही पात्र बनते थे। वह खुद दशरथ का किरदार निभाते थे और जिस प्रकार राजा दशरथ को बहुत मिन्नत के बाद चार पुत्र हुए, उसी प्रकार भगवान ने काफी मिन्नतों के बाद मुझे भी एक बेटा दिया। बेटे के जन्म के बाद तो रामलीला को लेकर मेरी आस्था और उत्साह दोनों बढ़ गया। पिछले साल तक मैंने राजा दशरथ का रोल अदा किया। कई बार कलाकारों के अभाव में रावण भी बनना पड़ा। यही नहीं, उनका बेटा कृष्ण कुमार भी रामलीला में परशुराम की भूमिका बेहतर ढंग से निभाता है। उन्होंने रामलीला को गांव की एकता का सूत्र भी बताया। उनका कहना है कि रामलीला के बहाने लोगों की आपसी मनमुटाव भी मंच पर दूर हो जाती थीं। लेकिन आधुनिकता के दौरान में यह परंपरा टूट गई। उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि गांव की यह परंपरा टूट सकती है। यह सब उनकी आंखों के सामने हुआ, इसका अफसोस है। उनका कहना है कि नवरात्र के पहले दिन से ही यहां मेले जैसा माहौल रहता था। यहां नवरात्र की तैयारी तो है लेकिन रामलीला नहीं होने से खालीपन लग रहा है। उन्होंने कहा कि अगले साल वह फिर से रामलीला का आयोजन कराएंगे।
00000
रामलीला के मंच पर परिणय सूत्र में बंधे राम और सीता
महराजगंज। बरगदवां के तीन दशक पुराने रामलीला की यूं तो बहुत सी यादें है, लेकिन 2009 में हुई रामलीला गांव वालों को भूलती ही नहीं है जब रामलीला में राम और सीता बने एक जोडे़ मंच पर ही असल में परिणय सूत्र में बंध गए। लोग बताते हैं कि वर्ष 2009 में रामलीला आयोजन समिति के अध्यक्ष रामप्रेम यादव के बेटे इंद्रजीत की शादी सिसवा क्षेत्र के गुरली रमगढ़वा में तय हुई। शादी तय होने पर रामप्रेम ने शर्त रखी की शादी होगी तो रामलीला के मंच पर ही। बस क्या था लड़की वाले अपनी लड़की लेकर आ गए। रामलीला में राम बने इंद्रजीत और सीता बनी नेमा ने रामविवाह के मनोरम दृश्य के बीच शादी के बंधन में बंध गए। इसके बाद भव्य भोज का भी आयोजन किया गया। इस विवाह को लेकर भी बरगदवा की रामलीला काफी चर्चा में रही।