चला गया एक ‘निशब्द’ फरिश्ता
दिल में बसेंगी उनकी यादें, सजदे में झुकेगा सिर
अमर उजाला ब्यूरो
महराजगंज। वह एक ‘निशब्द’ फरिश्ता थे। हमारे दिल में बसते थे। अब उनकी यादें इस दिल में रहेंगी। कभी उनके सजदे में ये सिर झुकेगा तो कभी उनकी बातें हमारी आंखें नम करेंगी। बार-बार उनकी यादें आएंगी और हमें रुलाएंगी, लेकिन हमें इस बात की प्रेरणा भी देंगी कि हम उन जैसा बन जाएं। ये उद्गार एक-दो-तीन नहीं उन दर्जनभर बच्चों के हैं, जिनके कंघे पर हाथ रख कर पंकज चाचा ने कभी पूछा था,‘और बेटा कैसे हो। पढ़ाई-लिखाई हो रही है या बस बदमाशी ही करते हो।’ प्यार से उनका डांटना और फिर अपनेपन से समझाना ये बच्चे आज भी नहीं भूले हैं। आज ये बच्चे जुबां से कुछ बोल तो नहीं कर पाए, पर उनकी बरसती आंखों ने सारे दर्द बयां कर दिए।
बच्चे जो बयां न कर पाए उसे पंकज त्रिपाठी के छोटे भाई शुभम ने बताई। उन्होंने कहा कि बड़े भाई के लिए पूरा गांव ही परिवार था। गांव का हर बच्चा उनका अपना था। छुट्टी में जब भी घर आते बच्चों से घिरे रहते। कोई कॉपी की फरमाइश करता तो कोई पेंसिल की। कोई कहता, चाचा किताबें नहीं हैं। बापू कहते हैं अगले महीने खरीद दूंगा। पंकज इन बच्चों की जरूरतें पूरी करतें, लेकिन कभी इस बारे में किसी को बताया नहीं। घर के लोगों से भी वह इस बारे में कभी बात नहीं करते थे। उनकी ये अच्छाइयां आज इन बच्चों की आंखों से आंसू बनकर बह रहे हैं।
शुभम ने कहा कि बड़े भाई की शहादत से पूरे गांव में गम और गुस्सा है। हर कोई चाहता है कि आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब मिले। हमारा बड़ा भाई हमें छोड़ गया इस बात का गम हैं, लेकिन इस बात का गर्व है कि वह देश के लिए शहीद हो गए। हमारे परिवार के लिए यह फख्र की बात है। रिश्तेदार मुरलीधर, रत्नेश त्रिपाठी और दोस्त प्रमोद पासवान तो पंकज का जिक्र आते ही फफक पड़े। कहा कि दस दिन पहले पंकज छुट्टी पर आया था। ड्यूटी पर जाते समय पिता से वादा कर गया था कि इस बार आऊंगा तो अधिक समय आप लोगों के साथ रहूंगा, लेकिन कौन जानता था कि वह एक ऐसे सफर पर जा रहा है, जहां से कोई लौटकर नहीं आता।