डोंगराखुर्द। बुंदेलखंड में सबसे अधिक औषधीय पेड़ पौधों वाले ललितपुर जिले के जंगलों में उपलब्ध जड़ी- बूटियों का अस्तित्व खतरे में है। सदियों से सहरिया आदिवासी परिवारों के लिए जंगल आजीविका का साधन रहा है। लेकिन, धीरे- धीरे जड़ीबूटियां समाप्त हो रही हैं। किसी जमाने में आयुर्वेद फार्मेसियों के लिए ललितपुर से सफेद मूसली, अश्वगंधा समेत अनेक जड़ी बूटियां सप्लाई होती थीं, पर अब धीरे-धीरे इनका उत्पादन घट रहा है । इस ओर न तो वनविभाग का ध्यान है और न ही सरकार की।
सदियों से सहरिया आदिवासी परिवारों के लिए जंगल आजीविका का साधन रहा है, लेकिन जड़ी- बूटियों के अंधाधुंध दोहन से इनके रोजगार पर भी खतरा मंड़राने लगा है। जिले के गौना वन क्षेत्र एवं मड़ावरा वन क्षेत्र में वन औषधियों का भंडार है। जंगल में सफेद मूसली, काली मूसली, बेल, आंवला, खैर, अर्जुन, हरसिंगार सहित विभिन्न प्रजाति के औषधीय पौधे हैं। जो जानकार हैं वह जड़ी- बूटियों से अपना इलाज कर लेते हैं, क्योंकि उन्हें वनौषधियों के उपयोग की जानकारी है। सफेद और काली मूसली पहले जंगल क्षेत्र में जगह- जगह पाई जाती थी, लेकिन अब यह खोजने से भी नहीं मिलती है। यहां पर बेल और आंवले का दोहन समय से पहले कर लिया जाता है। बेल पकने नहीं दिया जाता है तथा आंवला के फल को परिपक्व नहीं होने दिया जाता है। क्षेत्र में चिरौंजी फल भरपूर है, पर इसको भी पकने नहीं दिया जाता। फल पके तो बीज गिरेगा और फिर नया पौधा तैयार होगा, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
जंगलों में उपलब्ध जड़ी- बूटियों का गलत तरीके से दोहन होने से अस्तित्व खतरे में है। एक समय था जब अधिक मात्रा में जड़ी- बूटियां उपलब्ध थीं। जंगल के संरक्षण के लिए शासन काम कर रहा है, पर, जंगलों में उपलब्ध जड़ी - बूटियों के संरक्षण के लिए काम नहीं हो रहा है। यदि समय रहते जड़ी बूटियों के संरक्षण संवर्धन का कार्य करके उन्हें विलुप्त होने से बचाया जा सकता है। इनका दोहन सही तरीके से करने से जड़ी- बूटी विलुप्त नहीं होगी तथा लोगों की आजीविका के संसाधनों में भी वृद्धि होगी।
सफेद मूसली पहले जंगलों में भरपूर मिलती थी, जिससे सहरिया परिवारों की गुजर- बसर चलती थी। लेकिन, अब ऐसा नहीं है। दवा कारोबारियों का सर्वाधिक ध्यान सफेद मूसली पर है।
कई रोगों की औषधियां जंगल में पाई जाती हैं। इनमें चितावर, शतावर, सेमर मूसली, महुआ मूसली, सफेद मूसली, अमलतास, गुमेर, अश्वगंध, बड़ी गुलठरी, मोरी कुदरा, कैम, हड़ुआ, कुरो, कर्र की गाद ,संखाहोली, बीजासार, बहेड़ा, आंवला, बेल की छाल, शहद ,बगनथू, हरश्रृंगार, चिलो आदि जड़ी बूटियों का भंडार है। विशेषकर गौना वन रेंज के ग्राम डोंगरा खुर्द, दिगवार, पटना और पांडव वन के जंगलों में यह जड़ी- बूटियां पाई जाती रही हैं।
सिद्धटेकरी के नीचे पांडव वन में नदी के दोनों ओर पत्थरों की चट्टानों पर शिलाजीत पाई जाती है। जानकार इसकी खोज करने आते हैं और हफ्तों डेरा ङाले रहते हैं। लेकिन, शिलाजीत बहुत कम पाया जाता है, इसलिए बहुत कम लोगों को मिल पाता है। पहाड़ों पर रहने वाले बंदर इसको पहले ही खा जाते हैं।
- इद्रपाल सिंह लोधी
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दस साल पहले पर्याप्त मात्रा में जड़ी- बूटी मिल जाती थीं, लेकिन अब धीरे-धीरे करके नष्ट होती जा रही हैं। नष्ट होने का मुख्य कारण है परिवारों के पालन पोषण करने के लिए जंगल का गलत तरीके से दोहन। पैसा कमाने के चक्कर में औने- पोने दामों में जड़ी- बूटियां खरीदारों को बेची जा रही हैं।
- जुग्गा सहरिया
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वन अधिनियम के तहत आदिवासियों को जीवनयापन करने के लिए जड़ी- बूटी एकत्रित करने की छूट दे दी गई है। कुछ जड़ी- बूटियां प्रकृति की देन हैं, जो अपने आप जंगल में उग आती हैं। बाकी के पौधों का रोपण वन विभाग द्वारा द्वारा कराया जाता है।
- आरके शाही, वन क्षेत्राधिकारी रेंज गौना