ललितपुर। जल निगम की कार्यदायी संस्था सिविल शाखा एकल ग्राम परियोजनाओं के
स्थान पर ग्राम समूह पेयजल योजनाओं पर जोर दे रही है। यह बात अलग है कि
कुछ समय बाद बड़ी परियोजनाएं अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने में नाकाम साबित
हो रही हैं। ऐसे में करोड़ों रुपए की यह परियोजनाएं घाटे का सौदा साबित हो
रही हैं और गांव के लोगों तक पानी नहीं पहुंचने से समस्या का समाधान भी
नहीं हो पा रहा है।
केंद्र और प्रदेश सरकार गांव-गांव तक शुद्ध पेयजल
पहुंचाने के लिए प्रयासरत है। इसके लिए वह जनपद में अरबों रुपए की
धनराशि भेजती है। जल निगम की कार्यदायी संस्था सिविल शाखा एकल और ग्राम
समूह परियोजनाएं बनाकर नदियों, बांधों व बड़ी नहरों से पानी उठाकर ग्राम
समूह पेयजल योजनाओं से दर्जनों गांवों में पाइप लाइन डालने का काम करती
है। आगामी 30 सालों को ध्यान में रखकर बनने वाली यह परियोजनाएं पांच से
दस साल में ही दम तोड़ती नजर आती हैं। इसके बाद जिम्मेदार अफसर ध्यान देना
छोड़ देते हैं। वर्ष 1976 में 15 करेाड़ रुपए की लागत से शुरू हुई
पिपराबांसा परियोजना वर्ष 1998-99 में बनकर तैयार हो गई। इस परियोजना से
76 गांव में पानी पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया। वर्ष 2005 आते-आते आधे
गांव में पानी पहुंचना बंद हो गया। बाद में मात्र 20 गांव तथा अब वर्तमान
में धौर्रा क्षेत्र के एक दर्जन गांवों में पानी पहुंचाया जा रहा है।
वहीं, आलापुर ग्राम समूह पेयजल योजना से आधा दर्जन गांव को जोड़ा गया। यह
भी पांच साल में खत्म हो गई।
वर्तमान में ग्राम पड़ौरिया, कुमरौला, बेसरा
सहित अन्य गांव में पानी नहीं आ रहा है। करोड़ों रुपए की लागत से बनने
वाली यह परियोजनाएं समय से पहले ही दम तोड़ देती हैं। इसके बाद भी विभाग
नई ग्राम समूह पेयजल योजनाओं को स्वीकृति देता चला आ रहा है। हालांकि,
विभाग इन परियोजनाओं को पूर्ण करने के बाद जल संस्थान को हैंडओवर कर देता
है। अब पेयजलापूर्ति की समस्त जिम्मेदारी जल संस्थान पर थोप दी जाती है,
लेकिन पानी नहीं पहुंचने से ग्रामीण लगातार शिकायतें करते हैं। इसके बाद
इन बड़ी परियोजनाओं को छोटा कर दिया जाता है। लगातार अफसल होती आई समूह
परियोजनाओं के बाद भी विभाग ने 24 गांव को जोडने वाली मथुराडांग ग्राम
समूह पेयजल योजना, बांसी हर्षपुर ग्राम समूह पेयजल योजना, गौना ग्राम
समूह पेयजल योजना, रानीपुरा ग्राम समूह पेजयल योजना सहित कुल आधा दर्जन
योजनाओं को स्वीकृत कर दिया गया है। इनके लिए धन आवंटित हो चुका है।
हैरानी की बात तो यह है कि इसमें करोड़ों रुपए खर्च किया जाएगा और बाद
में यह परियोजनाएं समय से पहले ग्रामीणों तक पानी पहुंचाने में नाकाम
साबित होंगी।
हैंडओवर के नाम पर दवाब
जल निगम
की कार्यदायी संस्था करोड़ों रुपए की लागत से ग्राम समूह पेयजल योजनाएं
बनाकर जल संस्थान को हैंडओवर करता आ रहा है। परियोजनाओं में खामियां होने
से जल संस्थान के अवर अभियंता हैंडओवर करने से मना कर देते हैं। इसके बाद
अफसरों व शासन स्तर से दवाब डलवाया जाता है। इसके बाद परेशानी को जल
संस्थान के अफसर भुगतते चले आ रहे हैं।
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गहराई के नाम पर भी खेल
जल
निगम की कार्यदायी संस्था में होने वाले करोड़ों रुपए के कार्यों में
जमकर खेल होता रहा है। इंटेक बेल और सीडब्ल्यूआर के निर्माण में मानकों
का ध्यान नहीं रखा जाता है। शुरुआत से लेकर अंतिम छोर तक पाइप डालने के
दौरान इसकी गहराई एक मीटर जरूरी है। साथ ही गांव-गांव तक पानी पहुंचे
इसके लिए ढलान का विशेष ध्यान रखा जाता है। लेकिन, गहराई से लेकर अन्य
मानकों को हवा में उड़ा दिया जाता है। गहरे के स्थान पर कम गहराई पर
पाइपों को डालकर लाखों रुपए बचाया जाता है। विभागीय जिम्मेदारों व
ठेकेदारों की मिलीभगत होने के कारण इस पर कोई अंगुली नहीं उठाता है।
----इनका कहना है--
ग्राम
समूह पेयजल योजनाएं पानी के स्रोत को देखकर बनाई जाती हैं। यह जरूर है कि
कुछ साल बाद यह परियोजना गांव में पानी नहीं पहुंचा पातीं। शासन की ओर
से एकल ग्राम योजनाओं को अधिक से अधिक बनाने को निर्देशित किया गया है,
लेकिन मजबूरी में ग्राम समूह पेयजल योजनाएं बनाई जाती हैं।
- लालजीत , परियोजना निदेशक जल निगम