बुंदेलखंड के राई व सैरा लोकनृत्य की प्रस्तुति से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले ललितपुर जनपद के लोक कलाकार शिवराज की मौत के बाद उनका परिवार दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में इस परिवार की लोककला पर गूंजने वाली तालियों से बुंदेलखंडवासियों का सिर फक्र से ऊंचा हो जाता था। दिल्ली लाल किले पर गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस के समारोह में भी यह परिवार अपनी कला का लोहा मनवा चुका है, पर शिवराज की मौत और लोककलाकारों के प्रति सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये के चलते आज ये लोग अपना पारंपरिक राई व सैरा नृत्य छोड़कर मजदूरी करने कोमजबूर हैं, इसके चलते कला और कलाकार दोनों दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।
शिवराज जीवित रहते हुए भी अपनी पेंशन के लिए दिक्कतें झेलते रहे हैं और आज उनका परिवार भी रोजी-रोटी को मोहताज है। बिधवा बहू व नाबालिग पोते मजदूरी करके किसी प्रकार अपना परिवार चला रहे हैं। कच्ची झोपड़ी में जीवन गुजार रहे परिवार को सरकार द्वारा संचालित आवास और शौचालय योजना तक का लाभ नहीं मिला पा रहा है।
कौन थे शिवराज
ग्राम पनारी निवासी राई लोकनृत्य कलाकार शिवराज सिंह ठाकुर के जीवन का अधिकांश समय बुंदेली लोकनृत्य राई व सैरा के लिए समर्पित रहा। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, सोनिया गांधी, पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा दिल्ली में गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर लोकनृत्य के लिए सम्मानित भी किया गया था। उन्होंने अपनी मंडली के कलाकारों के साथ झांसी, लखनऊ, कानपुर, अहमदाबाद, नागपुर समेत कई बड़े शहरों व राजधानियों की अपनी कला काट प्रदर्शन कर जनपद का नाम रोशन किया था। उनकी मंडली में जनपद की ही दो महिला लोकनृत्य कलाकार लीला और फूला एवं गांव के ही पजन सिंह भी शामिल रहे हैं। शिवराज सिंह को लोकनृत्य कला के प्रदर्शन के लिए वर्ष 1994-95 में नौशाद पुरुस्कार भी राज्यपाल द्वारा लखनऊ में प्रदान किया गया था। उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें केंद्र सरकार से पेंशन सुविधा भी मिली, जो कुछ वर्षों तक तो मिली, लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में सरकार द्वारा वह पेंशन भी बंद कर दी गई थी। जिसके बाद से वह बदहाली जीवन जीते रहे और तीन वर्ष पूर्व परलोक को सिधार गए। इसके बाद उनके परिवार में विधवा बहू और दो पोते हैं, जो अब भी बदहाली का दंश झेल रहे हैं।
कलाकार मृतक शिवराज की विधवा बहू जानकी विभिन्न योजनाओं में प्राइवेट संस्थाओं के माध्यम से दवा वितरण, पोलियो की दवा पिलाने आदि में ड्यूटी लगवाकर किसी प्रकार घर खर्च में मदद करती है, तो शिवराज के दो पोते भी हैं जो पढ़ाई के साथ जगह-जगह दुकानों पर मजदूरी करते हैं और मां के साथ परिवार की रोजी रोटी में मदद करते हैं। बड़ा पोता अक्षय सिंह ठाकुर शहर के पीएन स्कूल में 11वीं का छात्र है जो पढ़ाई के साथ ही बर्तन की दुकान पर काम करता है। जबकि छोटा पोता राजाबाबू आठवीं का छात्र है और स्कूल बंद होने पर परिवार के चचेरे भाईयों के साथ इंदौर में जाकर बैट्री की फैक्ट्री में काम कर बड़े भाई व मां का पैसों में हाथ बटाता है। विधवा मां और दोनों बेटे आज भी पुराने जर्जर छप्परयुक्त मकान में रहने को मजबूर हैं, जो बारिश में उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर देती हैं। घर में रहने को न तो छत है और न ही शौचालय। ऐसे में परिवार के सदस्यों को खुले में शौच के लिए खेतों में जाने को मजबूर होना पड़ता है। सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन भी कर चुके हैं, इसके बाद भी उन्हें योजनाओं का लाभ किन्हीं कारणों से नहीं मिल सका है। की मृत्यु तीन वर्ष पहले 19 दिसंबर 2015 को हो चुकी है। उ
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