पारौल गाँव में झोपङियों में रहकर जीवन यापन करते आदिवासी
- फोटो : LALITPUR
ङोगराखुर्द/ललितपुर। जिले के अंतिम छोर पर स्थित विकासखंड मड़ावरा क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश सहरिया आदिवासियों का प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत निर्मित हो रहे आवास में रहने का सपना अधूरा ही रह गया। इसका उदाहरण ग्राम पारौल है। इस ग्राम में तमाम सहरिया आदिवासी आज भी कच्चे मकानों व झोपड़ी में रहने को विवश हैं।
जनपद में मड़ावरा विकासखंड अन्य ब्लाकों में पिछड़ा है। यहां रहने वाले सहरिया आदिवासी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से वंचित हैं। ऐसा ही कुछ हाल ग्राम पारौल का है। इस गांव को पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती अपने कार्यकाल में आदर्श ग्राम योजना में गोद लिया था लेकिन गांव की तस्वीर नहीं बदल पाई। यहां तमाम सहरिया आदिवासी पक्के आवास के अभाव में झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। इस गांव में करीब 100 परिवार निवास करते हैं।
बच्चों को साथ लेकर कच्ची झोपड़ी में रह रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना में आवास दिलाने की मांग कई बार की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई है। राधा
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सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। आदिवासियों की कोई सुनता भी नहीं है, जिससे मेहनत मजदूरी कर अपना गुजर बसर कर रहे हैं। कमलों।
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सहरिया परिवारों के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना में लाभ नहीं मिलने की जानकारी नहीं है। आदर्श गांव पारौल सहित अन्य गांवों में रहने वाले सहरियों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाया जाएगा। इस सबंध में जिलाधिकारी से मिल कर बात करेंगे और जल्द लोगों की समस्याओं का समाधान कराया जाएगा। मनोहरलाल पंथ मन्नू कोरी, श्रम एवं सेवायोजन राज्यमंत्री उप्र शासन।
पारौल गाँव में पत्थर से बनी झोपड़ी में रहकर जीवन यापन करते आदिवासी महिलाएं- फोटो : LALITPUR