डोंगराखुर्द (ललितपुर)। होली पर्व पर नशा के बढ़ते चलन से लोग परंपरागत होली से दूर होते जा रहे हैं। वर्षों पहले ग्रामीण क्षेत्र में गोबर और कीचड़ की फाग खेलने की परंपरा थी जो अब लुप्त हो गई है। अब रंग गुलाल की होली ही सीमित रह गई है। वर्षों पहले जनपद में रंगों का पर्व होली बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था। वर्तमान समय में होली पर्व पर शराब के बढ़ते चलन ने त्योहार के रंग को फीका कर दिया है। इस दौरान तमाम लोग पुरानी रंजिश भी निकालने से नहीं चूकते हैं। यही वजह है कि अधिकांश लोग अब होली के हुड़दंग में शामिल होकर होली खेलने से परहेज करने लगे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में होली के पर्व का अलग दिखता उत्साह
ग्रामीण अंचलों में होली का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। होली त्योहार पर रबी की फसलें पककर तैयार हो जाती हैं। खेती के काम से सभी लोगों को रोजगार मिल जाता है। गरीब हो या अमीर सब के घर त्योहार खुशी-खुशी मनाया जाता है और घर-घर में तरह तरह के पकवान बनते हैं और लोग इस त्योहार को मिलजुलकर खुशी के साथ मनाते हैं।
होलिका दहन के बाद घर-घर बाटियां बनती थीं। इसके बाद लोग घर पूरा कामकाज छोड़ कर एकत्रित होकर पूरे गांव में गोबर व कीचड़ की होली खेलते थे लेकिन अब लोगों में प्रेम भाव नहीं रहा है। जिससे लोग परंपराओं से दूर होते जा रहे हैं। - भस्सू कुशवाहा।
40 साल पहले लोग मिलजुलकर रहते थे, उस समय अच्छा माहौल था। लोगों में आपसी बुराई नहीं रहती थीं और पूरे रात भर ढोल नगड़ियां के साथ फागे गाते थे लेकिन अब समय बदल गया है। लोग नशा पत्ती करने लगे, जिससे लड़ाई-झगड़ा होने लगे है।
- मकुंदी लाल सेन