ललितपुर। जैन मुनि विशद सागर महाराज ने क्रोध को आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु बताया। उन्होंने जीवन में क्षमा का भाव रखने पर जोर दिया, जिससे वैर नहीं होगा। कहा कि गृहस्थ का धर्म स्वयं के हाथ में है, यही दशलक्षण है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार फल भोगता है। क्रोध एक आग है जो सबको जलाती है और दिल को ठेस पहुंचाती है। वह बुधवार को जैन पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अटा मंदिर में पर्यूषण पर्व पर धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सभी के प्रति क्षमा का भाव रखने से कोई वैर नहीं होता है। गृहस्थ का धर्म स्वयं के हाथ में है, जिसे दशलक्षण कहा गया है। उन्होंने कहा कि यह हमारी जिंदगी है, इसके साथ जीना ही धर्म है। जो लोग अभाव में जीते हैं, उन्हें अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहिए। संसार में हम अपने कर्मों के अनुसार ही चलते हैं और फल भोगते हैं। हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है कर्म ही हमें जैसा कराएगा, वैसा ही जिएंगे। क्रोध एक आग के समान है जो सबको जलाती है और दिल को ठेस पहुंचाती है। दुश्मन के सामने क्रोध करना और अपनों के सामने राग रखना आवक की परिणति है।
धर्मसभा को शुभारंभ आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलन श्रेष्ठीजनों एवं मंगलाचरण मनोज जैन द्वारा किया गया। इस दौरान सुषमा जैन, मेधा जैन,रिचा जैन,आरुष जैन ने तत्वार्थ सूत्र का वाचन किया जबकि अर्ध्य समर्पण का पुन्यार्जन महेंद्र सराफ परिवार द्वारा किया गया गया। धर्मसभा का संचालन महामंत्री आकाश जैन ने किया।