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रंग भरी बड़ी कढ़ाही में डुबोकर होली खेलने की अनूठी परंपरा

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ललितपुर। होली का रंग और हुड़दंग हमेशा से सिर चढ़कर बोलता है। ऐसा ही शहर के पुराने मोहल्लों व गांवों में देखने को मिलता है। हालांकि, अब यह परंपरा महज रस्म रह गई है पर इसकी धुंधली यादें आज भी शेष हैं। शहर में गड्ढों के कीचड़ और बड़ी कढ़ाही में भरे रंगों में लोगों को गिराकर होली खेलने की परंपरा दो दशक पुरानी है, अब भी खेली जाती है, पर अब वह बात नहीं रही जो बीस साल पहले हुआ करती थी।
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शहर में होलिका दहन के दूसरे दिन कीचड़ और तीसरे दिन रंगों की होली खेलने का रिवाज रहा है। पुराने मोहल्लों और गांवों में होलिका दहन के दूसरे दिन कीचड़ की होली खेली जाती थी। इसके लिए मोहल्लों में कई गड्ढों में कीचड़ तैयार किया जाता था और उस कीचड़ से ही होली खेलने का रिवाज था, चाहे कोई भी राहगीर हो या मोहल्लावासी, सभी को कीचड़ में उठाकर पटक दिया जाता था। इसके लिए शहर में मोहल्ला चौबयाना में होली गढ़ा, रावरपुरा, महावीरपुरा, तलैया पुरा, अजीतापुरा, बड़ापुरा, वंशीपुरा, तालाबपुरा, लक्ष्मीपुरा प्रसिद्घ रहे हैं।
गांवों में महिलाएं भी पुरुषों पर कीचड़ फेंकती थीं। होलिका दहन के तीसरे दिन भाई दूज पर पूजन व तिलक के बाद मोहल्लों में रंगों की होली खेलने के लिए मुख्य चौराहों पर पांच से सात आदमियों को एक साथ रंग में डुबो देने वाली कड़ी कढ़ाही रखी जाती थी। इसमें मोहल्लेवाले टोलियां बनाकर लोगों के घर जाते थे और उन्हें घर के भीतर से पकड़कर लाने के बाद उसे रंग से भरी कढ़ाही में ड़ुबकी लगवाते थे।
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मोहल्ला चौबयाना का होली गढ़ा, सटक चौराहा, रावरपुरा, बड़ापुरा, महावीरपुरा व तालाबपुरा में बड़ी कढ़ाही रखने की परंपरा रही है। हालांकि, समय के साथ अब यह परंपरा मात्र रस्म के रुप में बची हुई है। शहर व गांव के कई मोहल्लों में अब भी कढ़ाही रखकर रंग की होली खेली जाती है। कीचड़ की होली भी रंगों व गुुलाल की होली में ही सिमट कर रह गई है। होली खेलने की परंपरा के बारे में जब लोगों से बात की तो उन्होंने दो दशक पूर्व तक खेली जाने वाली होली के अपने अनुभव बताए।
बुंदेलखंड में होली तीन दिन की होती है। इसमें पहले दिन होली जलाने के बाद दूसरे दिन कीचड़ से होली खेलने की परंपरा रही है। लेकिन, पिछले पंद्रह साल से कीचड़ की होली के दिन भी रंगों की होली ही खेली जाने लगी है। जबकि, तीसरे दिन रंगों की होली की परंपरा आज भी है, जो गुलाल लगाने तक सीमित बची है। पहले रंगों की होली खेलने के लिए मोहल्लों के चौराहों पर बड़ी कढ़ाही रखी जाती थी। कोई भी हो, कढ़ाही में डुबोये बिना आगे नहीं निकल पाता था। कढ़ाही में रंगों से भीगने के लिए एक- दूसरे के घर जाकर दाल बाटियां खिलाने की परंपरा रही है।
- महेंद्र सिंह परमार, ग्राम गुलैंदा।
पहले आत्मीयता और स्नेह के साथ कीचड़ और रंगों की होली खेली जाती थी। यदि कोई गली से निकलता तो उसे रंगों से भरी कढ़ाही में डुबकी लगवाने के बाद ही छोड़ा जाता था। मोहल्ला चौबयाना में दो दशक पूर्व तक होली गढ़ा स्थल पर बड़ी कढ़ाही रखी जाती थी, जिसमें एक साथ पांच लोगों को भी डुबोया जा सकता था। यदि पड़ोस का व्यक्ति हुआ तो उसी के घर जाकर मिष्ठान व पकवान खाने की परंपरा थी। लेकिन, अब यहां मोहल्ले व जान पहचान के लोगों के साथ ही होली खेली जाती है, ताकि किसी को बुरा न लगे।
- कैलाश कुशवाहा, पूर्व पार्षद।
दो दशक पूर्व की होली यादगार होती थी। होली को यादगार बनाने के लिए मोहल्लों की टोलियों द्वारा एक महीने पहले से तैयारी की जाती थी। मोहल्लों में रंग- बिरंगे कागजों की जरियां लगाकर सजावट की जाती थी। इसके बाद रंगों की होली के लिए मोहल्ले में बड़ी सी कढ़ाही रखी जाती थी और इस कढ़ाही में उस स्थान से निकलने वाले सभी लोगों को पटखकर रंगों से सराबोर कर दिया जाता था। इसके बाद ढोल बाजों के साथ मोहल्ले में नाच गाने का आयोजन होता था।
- दिनेश गोस्वामी, चौबयाना।
शहर के पुराने मोहल्लों में कढ़ाही में रंगों की होली दो दशकों पूर्व तक खूब खेली जाती रही। कोई भी हो, रंगों की कढ़ाही में डुबकी के बाद ही आगे रवाना किया जाता था। हुरियारों की टोलियां उसी कढ़ाही में डुबकी लगाती थीं। रंगों से खेलने के बाद राई-सैरा का नृृत्य भी होता था।
- रामजी मालवीय।
शहर में कीचड़ और रंगों की होली का विशेष महत्व रहा है। कीचड़ की होली के बाद भाई दूज को रंगों की होली धूमधाम से मनाई जाती है। दो दशक पूर्व तक पुराने मोहल्लों में कढ़ाही और टंकियां रखी जाती थीं। इसी के रंगों को राहगीरों पर डाला जाता था। यदि कोई साफ कपड़े पहने निकला तो रंगों से भीगकर ही लौटता था। यदि कोई मना करता था तो उसे बड़ी कढ़ाही में जरुर डुबोया जाता था।
- रामदास श्रोतीय, रघुनाथजी बड़ा मंदिर, चौबयाना।
रंगों की होली के दिन मोहल्ले में बड़ी कढ़ाही या टंकी में रंग घोला जाता था। रंगों से होली खेलने के लिए सभी साथियों के साथ कढ़ाही में खुद ही कई बार डुबकी लगाते और दूसरों को भी डुबकी लगवाते थे। रंगों से होली खेलने के बाद दाल बाटियां बनाकर मिल- जुलकर खाते थे। अब रंगों की होली गुलाल की होली में बदलती जा रही है।
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- राजेंद्र मालवीय, स्थानीय निवासी।
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