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Lalitpur News: विभाजन का दर्द आज तक नहीं भूले, बड़ी मुश्किल से कटे वो दिन

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- झांसी में रह रहे कई लोग 1947 में विभाजन के बाद घर, संपत्ति छोड़कर भारत आ गए थे
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अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। हिंदुस्तान विभाजन के दौरान पाकिस्तान से अपना सबकुछ छोड़कर भारत आए झांसी में रह रहे कई लोग उस दर्द को भूल नहीं पाए हैं। किसी ने एक जोड़ी कपड़े में कई दिन बताए तो किसी ने मंदिर और रेलवे स्टेशन पर दिन काटे। ट्रेन और पानी के जहाज से पाकिस्तान से भारत आने का सफर भी तमाम कठिनाइयाें भरा रहा। ठूंस-ठूंसकर लोग भरे हुए थे। शरणार्थी शिविरों में भी खानपान की काफी परेशानी हुई। हालांकि, लोगों ने अपनी मेहनत के बलबूते खुद को खड़ा भी किया। किसी ने व्यापार तो किसी ने नौकरी करके फिर से अपनी जमीन तैयार की और हंसी-खुशी परिवार के साथ रह रहे हैं। बृहस्पतिवार को अमर उजाला से उन्होंने अपने सुख-दुख साझा किए।



ऐसा लगा कि एक पल में ही सबकुछ छिन गया: सुरेंद्र कौर

सर्व नगर कॉलोनी की सुरेंद्र कौर चावला (92) का कहना कि पाकिस्तान में लाहौर के पास उनका घर था। पिता का अच्छा व्यापार था। विभाजन के समय पूरा परिवार ट्रेन से भारत आया था। साथ में कोई सामान नहीं ला पाए थे। ऐसा लगा कि एक पल में ही सबकुछ छिन गया। न रहने को घर था, न खाने को भोजन। रेलवे स्टेशन, मंदिर, गुरुद्वारे में रहकर परिवार ने दिन काटे। इसी दौरान उनकी बड़ी बहन बीमार पड़ गईं और एक महीने बाद उनकी मौत हो गई।
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रेलवे स्टेशन के बाहर भी दो वर्गों में हो गया था संघर्ष: सदोरामल

1947 में विभाजन से पहले तक सदोरामल रावलानी (92) का परिवार पाकिस्तान के सिंध प्रांत में रहता था। कहा कि जैसे ही विभाजन का एलान हुआ, वैसे ही पाकिस्तान में संघर्ष शुरू हो गया। वह परिवार के साथ ट्रेन से गुजरात के वीरवाल रेलवे स्टेशन पहुंचे। स्टेशन के बाहर भी दो वर्गों के लोगों में संघर्ष हो गया था। उस समय के हालत बहुत खराब थे। विभाजन के दौरान सभी लोगों ने बहुत यातनाएं झेलीं। वो दिन आज भी भूले नहीं जा सकते।


शरणार्थी शिविर में हुआ था बड़ी बहन का जन्म: अशोक
अशोक जैसवानी ने बताया कि उनके पिता परशुराम जैसवानी विभाजन के दौरान सारी संपत्ति छोड़कर दो जोड़ी कपड़े लेकर पाकिस्तान से भारत आ गए थे। इस दौरान चार दिन पानी के जहाज पर सफर करना पड़ा था। परिवार के साथ बंबई (अब मुंबई) में शरणार्थी शिविर में रुके थे। उनकी बड़ी बहन का जन्म भी शरणार्थी कैंप में ही हुआ। उस दौरान खानपान से लेकर कई तरह की परेशानियां झेलीं। उसके बाद नई बस्ती में सरकार की ओर से रहने के लिए जगह दी गई।
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शाम से शुरू हुआ था संघर्ष, रात में घर छोड़ निकला था परिवार: सुनील
व्यापारी सुनील हीरवानी ने बताया कि उनके पिता ज्ञानचंद हीरवानी को परिवार के साथ 14 अगस्त 1947 की देर रात को ही पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। क्योंकि, वहां पर शाम से ही बहुत संघर्ष शुरू हो गया था। पूरा परिवार पानी के जहाज से बंबई पहुंचा था। यहां कुछ दिन शरणार्थी शिविर में रहे। खाने-पीने की बहुत दिक्कत हुई। पिता का पाकिस्तान में अच्छा व्यापार था। मगर एक झटके में ही सबकुछ खत्म सा हो गया था। फिर से परिवार ने मेहनत करके खुद को खड़ा किया।
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