- आचार्य संघ का ललितपुर में चातुर्मास के लिए हुआ मंगल विहार
संवाद न्यूज एजेंसी
महरौनी। संत आचार्य निर्भय सागर ने कहा कि जो समाज भगवान की भक्ति करता है, परिवार समाज सेवा में लीन रहता है वह भक्त समाज कहलाता है। उन्होंने कहा कि भक्ति रूपी चाबी से मुक्ति महल में लगा ताला खुलता है। वह शुक्रवार को बड़े मंदिर में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे।
आचार्य श्री ने कहा कि परोपकार और सेवा परिवार के उत्थान का सूत्र है। जिस व्यक्ति के अंदर भक्ति की हवा भरी होती है वह वॉलीबॉल के समान होता है, उसे लोग गिरने नहीं देते बल्कि हाथों-हाथ में लिए रहते हैं। लेकिन जिसके अंदर अहंकार की हवा भरी होती है, वह फुटबॉल के समान होता है उसे कोई हाथ नहीं लगाता है। वह संसार की ठोकर खाता रहता है। अपने जीवन को फुटबॉल नहीं वॉलीबॉल बनाना चाहिए, तभी समाज में इज्जत होगी और स्वर्ग की ओर आत्मा की गति होगी।
आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक संसारी प्राणी आहार, भय, मैथुन और अपरिग्रह संज्ञा से पीड़ित है। इस पीड़ा को धर्म रूप औषधि से दूर किया जा सकता है। उन्होंने बुंदेलखंड की कहावत के अनुसार ‘कहा झांसी गले की फांसी, दतिया गले का हार, ललितपुर तब तक ना छोड़िए जब तक ना हो उद्धार’। पूजा, भक्ति एवं आरती की परंपरा अनादि कालीन है प्रातः काल देव की पूजा करना चाहिए। दोपहर में गुरु को आहार दान रूपी भक्ति करना चाहिए और शाम को संध्याकाल में धर्मशास्त्र की आरती करना चाहिए, यही त्रिकाल वंदना, भक्ति और पूजा है, इसको करने वाला तीन लोक का नाथ बन जाता है। प्रवचन के उपरांत आचार्य संघ की आहारचर्या हुई। तदुपरांत सामायिक करने के पश्चात आचार्य संघ का ललितपुर की ओर चातुर्मास के लिए मंगल विहार हुआ।