महरौनी (ललितपुर)। केंद्र सरकार के सामाजिक और आर्थिक जनगणना कार्य में घोर लापरवाही उजागर हो रही है। डोर टू डोर जाकर सर्वेक्षण कार्य करने का दायित्व जिन्हें सौंपा गया था, उन्होंने काम में हीलाहवाली की और मनमर्जी से डाटा फीड करा दिए। स्थिति यह है कि गरीबों को अमीर व अमीरों को गरीब दर्शा दिया गया, जिसका खामियाजा वास्तविक गरीब पात्र व्यक्तियों को भुगतना पड़ रहा है।
जनगणना के सर्वे में जिन परिवारों के गरीब होने के मानक को टिक करके सर्वे प्रपत्र पर भर दिए गए थे, वही परिवार बीपीएल श्रेणी में शामिल किए गए थे, फिर भले ही वह परिवार धनाढ्य अथवा साधन संपन्न ही क्यों न हों। सर्वे की मेहरबानी से अनेक वास्तविक गरीब परिवारों को प्रपत्रों में गरीबी की श्रेणी में अंकित ही नहीं किया गया, जबकि अनेक अमीर परिवारों को गरीब दिखा दिया गया। ऐसे प्रकरण अनेक ग्राम पंचायतों में देखने को मिल रहे हैं। भारत सरकार द्वारा जनगणना वर्ष 2011-12 में कराई गई थी, जिसमें भारी लापरवाही उजागर हुई है।
सामाजिक और आर्थिक जनगणना सर्वे मजाक की तरह उभर कर सामने आ रहा है। इस महत्वपूर्ण कार्य में लेखपालों, ग्राम विकास अधिकारियों के साथ अध्यापकों व ग्राम रोजगार सेवकों को लगाया गया था। मगर जब सर्वे रिपोर्ट जारी हुई तो लापरवाही उभर कर सामने आई। महरौनी विकासखंड की कुछ ग्राम पंचायतों के सर्वे पर गौर किया जाए तो सर्वेयरों का लापरवाहीपूर्ण रवैया स्पष्ट रूप से सामने आया। ग्राम पंचायत गौना में गरीबों/बीपीएल सूची में 260 परिवार अंकित होकर आए हैं, जिसमें मात्र 40 परिवार ग्राम गौना के हैं। शेष 120 परिवार ग्राम के निवासी ही नहीं है। उनमें लगभग सवा सौ परिवार तो सहरिया जाति के अंकित हैं, जबकि इस ग्राम पंचायत में एक भी सहरिया परिवार नहीं है।
इसी तरह ग्राम पंचायत साढूमल में 145 परिवारों की सूची जारी की गई है। इसमें से मात्र 80 पात्र निकले, जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र माना गया है। इनमें पांच परिवार ऐसे भी हैं, जो धनाढ्य हैं। लगभग 30 गरीब परिवार सर्वे में ही नहीं आए, जिन्हें अगले 10 साल तक योजनाओं के लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। ग्राम पंचायत सडकौरा में अत्यधिक उम्रदराज व्यक्तियों को जोड़ दिया गया है, पूरे ग्राम में मात्र 13 परिवार ही गरीबी की श्रेणी में आए हैं, जबकि कई गरीब परिवार छूट गए। इसी तरह ग्राम पंचायत कुम्हैड़ी में 180 परिवारों की सूची में से फिलहाल 92 परिवारों को पात्र माना गया है, जबकि सर्वे में पांच परिवार काफी धनी व्यक्तियों के जोड़ दिए गए।
ग्राम पंचायत सैदपुर में लगभग 180 गरीब परिवारों को शामिल किया गया है, लेकिन अधिकतर नाम अस्पष्ट हैं, कई नामों के पिता/पति के नाम के स्थान पर 4 व 5 आदि लिखा है। ऐसा कई ग्राम पंचायतों की सूचियों में पाया जा रहा है, जहां सूची में शामिल किए गए व्यक्तियों की जातियां नहीं लिखी गयी हैं और इससे उन परिवारों को पहचाना भी नहीं जा सकता है। इतना ही नहीं, ग्राम मुडिय़ा में तो सर्वे/जनगणना का कार्य किया ही नहीं गया। ग्राम पंचायत सौजना में लगभग 25 अपात्र परिवार जोड़ दिए गए और लगभग 70 परिवार जो गरीब हैं, उनका नाम सूची में नहीं आया है।
ग्राम बढ़ई के कुआ में आठ परिवारों को फीड कर दिया गया, जबकि वह गरीब परिवार नहीं है और अनेक गरीब परिवार छोड़ दिए गए। ग्राम बम्होरीघाट के ग्राम प्रधान ने बताया कि उनके ग्राम की सूची ही जारी नहीं हुई है। यह तो महज बानगी है, अनेक ग्राम पंचायतों के हालात ऐसे ही हैं। राशन कार्ड बनवाने के लिए जिला प्रशासन पर लगने वाले लोगों की कतार से इसे समझा जा सकता है।
खराब लैपटॉप से हुआ काम
कुछ डाटा इंट्री ऑपरेटर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें तो सर्वे के दौरान मौके पर ही फीडिंग करनी थी, किंतु लेपटॉप उपलब्ध कराने वाली ठेका कंपनी के कर्मचारी खराब लेपटॉप लेकर आए थे, जिससे उन्हें समय से लेपटॉप उपलब्ध ही नहीं कराए गए। ऐसे में मौके पर होने वाला फीडिंग कार्य कई दिनों बाद हो सका। परिणामस्वरूप फीडिंग सही नहीं हो सकी। अनेक मामले ऐसे भी रहे कि किसी एक गांव के प्रपत्र दूसरे गांव की सूची में फीड हो गए और सर्वेयर टीम पात्र को अपात्र और अपात्र को पात्र फीड करके चली गई। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा जनगणना पर खर्च किया गया धन बर्बाद हो गया। जनगणना का सर्वे अनेक गरीबों की समस्याओं का सबब बन गया।
सर्वे के बाद आपत्तियों के लिए समय दिया जाता है, लेकिन कोई आपत्ति नहीं आई होगी, जिससे सर्वे को अंतिम रूप दे दिया गया। अब इसमें कुछ नहीं हो सकता है।
- हरिश्चंद्र यादव, एसडीएम, महरौनी