ललितपुर। जनपद के रमपुरा गांव में सहरिया जाति के लोग निवास करते हैं। इनका प्रमुख काम पत्थर खनन है। काम करते समय सुरक्षा न होने के कारण पत्थर की धूल से सिलिकोसिस बीमारी हो जाती है, और इनकी उम्र घट रही र्है। दो दशक पूर्व तक यहां के लोग 40 की उम्र भी नहीं पार कर पाते थे। लेकिन, खनन कार्य बंद होने से पर्यावरण सुधरा तो वर्तमान में इनकी औसत उम्र बढ़कर करीब 46 वर्ष पर आ गई है।
जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी दूर रमपुरा गांव स्थित है। इस गांव में सहरिया आदिवासी जाति के लोग रहते हैं। इनकी आबादी करीब 300 है। छह दशक पूर्व तक ये लोग जीविकोपार्जन के लिए जंगलों में डहिया (जंगल साफकर पहाड़ियों पर छोटे-छोटे खेत) बनाकर ज्वार की खेती करते थे। बाद में मकान में लगाने के लिए इमारती पत्थरों की खदानों पर कटिंग शुरू हुई तो ये लोग भरण पोषण के लिए पत्थर खनन का काम करने लगे। दो दशक पूर्व तक खनन का कार्य तेजी से होता था और पत्थर के कणों से इनका स्वास्थ्य बहुत जल्दी खराब होता था। ये लोग सिल्कोसिस की बीमारी से ग्रसित होकर 35 से 40 की उम्र में ही दम तोड़ देते थे। वर्ष 2018 में खनन कार्य बंद हुआ और पर्यावरण बदला तो इनकी औसत उम्र बढ़कर 45 से 48 वर्ष तक पहुंच गई है। ग्राम प्रधान ने बताया कि इतनी कम आबादी के बावजूद यहां 25 महिलाएं विधवा हैं।
मुझे सांस लेने में तकलीफ होती है तथा खांसी भी आती है। मैं 8 साल से दवा खा रहा हूं। कभी कभी आराम पड़ता है लेकिन कुछ दिनों बाद सांस फूलने लगती है।
- लखन
इस रोग से पीड़ित हो गया था जिसका इलाज मैंने बिरधा अस्पताल में करवाया। 6 महीने दवा खाने के बाद मुझे आराम हुआ। अपवाद को छोड़ दिया जाए तो गांव में ज्यादातर महिलाएं एवं पुरुष 47-48 की उम्र तक ही जीवित रहते हैं।
- श्यामलाल, ग्राम प्रधान रमपुरा
श्वांस और दमा की बीमारी से पिछले चार साल से पीड़ित हूं। बीना जाकर निजी चिकित्सक से उपचार करा रहा हूं। दवा खाने तक तो आराम रहता है लेकिन दवा बंद करते ही समस्या जस की तस हो जाती है।
- अर्जुन सिंह
लॉकडाउन की वजह से बीना जाना मुश्किल हो गया है, ट्रेन अभी चल नहीं रही है इतने पैसे नहीं हैं कि मैं खुद के साधन से बीना पहुंच सकूं। यह बीमारी पुरुषों के साथ-साथ को भी है।
- हरी सिंह
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क्या है सिलिकोसिस
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सिलिकोसिस बीमारी पत्थरों में पाए जाने वाले सिलिका के कणों से होती है। पत्थरों को तोड़ते समय उसके कण श्वांस नली के माध्यम से फेफड़े में पहुंचकर उसे क्षतिग्रस्त कर देते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को जो बीमारी होती है उसे सिलिकोसिस कहते हैं। इसके लक्षण टीबी जैसे ही होते हैं, जैसे श्वांस फूलना, तेज खांसी आना, बलगम के साथ खून आदि, लेकिन यह टीबी नहीं होती। इससे पीड़ितों की उम्र घटती है। इसका पता करना फेफड़े की बायोप्सी के बिना संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का फेफड़ा जितना अधिक क्षतिग्रस्त होगा, उसकी आयु उसी अनुसार घटेगी। पीड़ित व्यक्ति को नियमित उपचार कराते रहना चाहिए ताकि वह समय रहते अपने को स्वस्थ कर सके। पत्थर खनन में लगे श्रमिकों का शिविर लगाकर लगातार उपचार किया जा रहा है।
- डा. अमित चतुर्वेदी
वरिष्ठ फिजीशियन
जिला चिकित्सालय, ललितपुर