ललितपुर। आचार्य आर्जव सागर महाराज ने उत्तम त्याग दिवस पर कहा ज्ञानपूर्वक किया गया त्याग ही वास्तविक त्याग है। उसी त्याग से शांति मिलती है, सांसारिक वस्तुओं से मुक्त होना ही त्याग है। उन्होंने कहा साधु परिग्रह से मुक्त होते हैं और चिंता विकल्पों से दूर होना चाहते हैं।
आचार्य आर्जव सागर महाराज ने पर्युषण पर्व पर श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मंदिर क्षेत्रपाल परिसर में बताया कि त्याग धर्म के धारक साधू हैं। जिसके द्वारा वह अपनी आत्मा से भिन्न परभावों को ग्रहण नहीं करते। साधुओं की अपेक्षा से परिग्रह की निवृत्ति को त्याग कहा है। गृहस्थों की अपेक्षा से त्याग का अर्थ दान लिया है। गृहस्थ के लिए चूंकि सर्वस्व का त्याग कर पाना संभव नहीं होता है। इसलिए उसको अपनी शक्ति के अनुसार दान की प्रेरणा दी है। इसके पहले रविवार की सुबह आचार्य एवं संघस्थ मुनि महान सागर, मुनि भाग्य सागर, मुनि महत्त सागर ,मुनि विलोक सागर, मुनि विवोध सागर , मुनि विदित सागर, मुनि विभोर सागर महाराज के समक्ष तत्वार्थ सूत्र का वाचन पिंकी एवं अंजली जैन द्वारा हुआ। प्रारंभ में आचार्य विद्यासागर महाराज एवं आचार्य आर्जव सागर महाराज की पूजन की गई। मध्याह्न में आचार्य ने संघस्थ मुनि को जैन धर्म का मर्म तत्वार्थ सूत्र के वाचन द्वारा बताया। दयोदय पशुसंरक्षण केन्द्र गौशाला में विराजमान श्रमण मुनि सुप्रभ सागर ने आत्म स्वभाव की प्राप्ति में त्याग को आवश्यक बताते हुए कहा ज्ञानी जन विशय राग कषायों से डरते हैं। त्याग नहीं और अज्ञानीजन राग का आवरण बनते हैं। संघस्थ मुनि प्रणत सागर ने श्रावकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं को रखा, जिसका निर्देशन ब्रह्मचारी साकेत भैया ने किया। आदिनाथ मंदिर नईवस्ती में शिष्य मुनि विनिश्चल सागर महाराज ने कहा त्याग करने के लिए कितना पुरुषार्थ करना पड़ता है। मोह की जंजीरों को तोड़ने के लिए संसार शरीर भोगों से बैरागी बनना पड़ता है।