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विकास की राह ताक रहा पांडव वन

Mon, 12 Sep 2016 01:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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pandav van, lalitpur new - फोटो : amar ujala, lalitpur news
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ललितपुर/डोंगराखुर्द। जनपद प्राचीन संपदाओं से भरा पड़ा है। लेकिन रखरखाव के अभाव में यह नष्ट होने की कगार पर हैं। ग्राम डोंगराखुर्द के पास विंध्यांचल पर्वत शृंखला पर स्थित सिद्ध क्षेत्र तपोभूमि और महाभारत कालीन प्राचीन पांडव वन विकास की राह देख रहा है। पर्यटकों को घने जंगली कच्चे रास्ते से पांडव वन तक पहुंचते को मजबूर होना पड़ रहा है। बरसात के दिनों में मदनपुर और पारौल से पांडव वन जाने वाले कच्चे मार्ग भी पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। क्षेत्र में वाहन सुविधा भी उपलब्ध नहीं है, जिसके चलते पर्यटकों को इस क्षेत्र तक अपने निजी साधन से ही पहुंचना होता है। 
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ग्राम डोंगराखुर्द के पास स्थित सिद्ध क्षेत्र तपोभूमि पांडव वन में महाभारत कालीन प्राचीन मूर्तियां, मंदिर व अन्य चित्रकारी संपदाएं भरी पड़ी है। घने जंगलों के बीच पर्वत शृंखलाओं की मध्य चोटियों पर पांडव वन जामनी नदी के तट पर बसा है। प्राचीन कथानुसार महाभारत काल में पांचों पांडवों ने एक इस प्राचीन स्थान पर एक वर्ष तक अज्ञात वास बिताया था। मान्यतानुसार पांडवों ने क्रियाएं यहां की हैं उसके पद चिह्न पर्वत शृंखला से करीब साठ फीट गहराई में जामनी नदी में पत्थरों पर दर्शित हैं। बताया जाता है कि उस समय नदी का सारा जल मोम हो गया था, जिससे पशु पक्षियों, व जानवरों और इंसानों के पैरों के चिह्न पत्थरों पर अंकित हो गए हैं, जो आज भी दर्शित होते हैं। यहां पांचों पांडवों व द्रोपदी की पिंडीनुमा मूर्तियां भी स्थित हैं, जिन पर आज भी उनके खुदरे नाम अंकित हैं।

इन पिंडियों के पास ही एक जल कुंड स्थित है, जिसका पानी चना की फसलों में इल्ली लगने पर खेतों की मेंड़ पर छिड़कने पर बचाव की मान्यता है। यहां पर पहाड़ियों से निकलता जल स्रोत जो साल भर कभी नहीं सूखता, लेकिन जेठ मास की अमावस्या पर ढाई दिन के लिए अब भी सूख जाता है। पर्वत शृंखला पर ऊंचाई पर बसा प्राचीन सूरजमुखी हनुमान मंदिर की भी काफी मान्यता है। यह प्राचीन स्थल व प्राकृतिक छटा बिखेरता प्राचीन स्थल डोंगराखुर्द के पास स्थित ग्राम पारौल से पांच किलोमीटर और मदनपुर सये 14 किलोमीटर दूर घने जंगली कच्चे जर्जर व खराब मार्ग पर स्थित हैं। 
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सैकड़ों वर्षों से इस प्राचीन स्थल पांडव वन में मकर संक्रांति पर पांच दिवसीय भव्य मेला का आयोजन होता चला आ रहा है, जबकि वर्तमान में इस मेला के आयोजन में सारी व्यवस्थाएं प्रशासनिक देखरेख में ग्राम पारौल की मेला समिति द्वारा कराया जाता है। हालांकि ग्राम पारौल के ग्राम प्रधान द्वारा कच्चे मार्ग पर मिट्टी डलवाकर सड़क सुधारने का प्रयास किया जाता है। बरसात के दिनों में यहां ट्रैक्टर भी बड़ी मुश्किल में पहुंच पाते हैं।

जबकि बरसात के दिनों में ही यह प्राकृतिक प्राचीन स्थल मनोहारी व सुहावना छटा बिखेरता दिखाई देता है। पारौल व मदनपुर से पांडव वन तक की सड़क तो जर्जर है ही, इसके साथ ही बिजली व पेयजल की व्यवस्था भी यहां नहीं है। पेयजल व्यवस्था के नाम पर यहां प्रशासन द्वारा एक हैंडपंप जरूर लगवाया गया था, लेकिन वह भी कई महीनों से खराब चल रहा है,  जिस पर यहां आने वाले पर्यटकों को कुंड का पानी पीने को ही मजबूर होना पड़ता है। यह क्षेत्र पुरातत्व धरोहर के रुप में पुरातत्व विभाग में दर्ज भी है, लेकिन विभाग व शासन, प्रशासन की अनदेखी के चलते इस क्षेत्र का अब तक विकास नहीं हो सका है। 

 पारौलवासी करेंगे विधानसभा चुनाव का बहिष्कार
प्राचीन स्थल पांडव वन से सटे ग्राम पारौल, बरखेरा व डोंगराखुर्द बिजली, पानी, स्वास्थ्य सेवाओं से कोसों दूर हैं। बरसात के मौसम में तो बीमारियों के चलते कई ग्रामीण आवागमन के अभाव में काल मुख में चले जाते हैं। कोई सुनवाई नहीं होने के चलते यहां के ग्रामीणों ने इस बार विधान सभा चुनाव के बहिष्कार का निर्णय लिया है। ग्राम पारौल में आयोजित बैठक में ग्रामीणों ने शासन प्रशासन से 11 सूत्रीय मांगों के तहत ग्राम बरखेरा में जामनी नदी पर पुल बनाए जाने, स्वास्थ्य, सिंचाई, विद्युत की व्यवस्था कराए जाने के साथ ही सफाई कर्मी तैनात किए जाने, ग्राम डोंगराखुर्द से ग्राम दिदौनियां तक सड़क निर्माण, पांडव तपो भूमि को पर्यटक स्थल में विकसित करने की मांग रखी। बैठक में बृजेंद्र शास्त्री, भानू अहिरवार, जगत सिंह, निर्पत सिंह, पप्पू रैकवार, कुुंजन, विक्रम, कुुदऊ, फूलचंद, इंद्रपाल, गंगाराम, खेत सिंह, प्रेम तिवारी, खलक सिंह आदि उपस्थित रहे।
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