ङोगराखुर्द/पाली। विंध्याचल की वादियों में स्थित भगवान नीलकंठेश्वर बलुआ पत्थर सेवनी स्वनिर्मित चंदेल कालीन मूर्ति पुरातत्व विभाग के अधीनस्थ है लेकिन विभाग की उदासीनता के चलते जीर्णशीर्ण हालत में पहुंचने के कगार पर है। मंदिर के भीतर की छत चटक गई और प्राकृतिक झरना के भोग शाला की दीवार गिरने के कगार पर है। आरोप है कि पुरातत्व विभाग ने कभी इस मंदिर को रंग रोगन करने की जिम्मेदारी नहीं दिखाई जिससे दीवारों पर कई जम गई है जिससे दीवारें काली दिखने लगीं। यही वजह है कि भगवान भोलेबाबा के दर्शन और फैली प्राकृतिक सुंदरता को छोड़ दे तो सब कुछ बदरंग नजर आता है ।
जिला मुख्यालय शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर विंध्याचल पर्वत श्रेणी पर स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर बहुत ही अद्भुत एवं अद्वितीय है। दूर-दूर से भगवान भोले के भक्त गण यहां पर दर्शन करने के लिए आते हैं। ऐसा बताया जाता है कि यह मंदिर बहुत ही चमत्कार मय है। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में जो नंदी मंदिर के बाहर विराजमान हैं, उनके कान में अपनी मनोकामना कह देने मात्र से ही वह पूरी हो जाती है। शिवरात्रि पर यहां आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है। यह मंदिर अपनी कोख में हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता को छुपाए है।
झरने का पानी बना देता है निरोगी
स्थानीय निवासी बताते हैं कि मंदिर के नीचे झरने का पानी कभी सूखता नहीं है। यह पानी कहां से आता है इस बात की भी जानकारी किसी को नहीं है। बताते हैं कि इस पानी को लगातार सेवन करने वाले की काया हमेशा निरोगी बनी रहती है उसे कोई बीमारी नहीं घेर सकती। पहाड़ों की कंदराओं से बहने वाला अद्वितीय औषधीय गुणों से युक्त इसका पानी यहां आने वाले लोगों को लोगों की सारी थकान हर लेता है।
शिव की त्रिमुखी प्रतिमा के नीचे है एक मुखी ज्योतिर्लिंग
मंदिर में काले पत्थर पर से भगवान की त्रिमुखी अद्भुत प्रतिमा के दर्शन होते हैं। इस प्रतिमा को नवमी दशमी सती में चंदेल कालीन राजाओं ने बनवाया था। मंदिर में शिखर नहीं है। मंदिर का वास्तु शिल्प देखते ही बनता है। मंदिर में भगवान शिव की त्रिमुखी प्रतिमा के नीचे फर्श पर एक मुखी ज्योतिर्लिंग स्थापित है। शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ के अर्ध नारीश्वर रूप मानते हैं। त्रिमुखी महेश प्रतिमा व एकमुखी ज्योतिर्लिंग को हिंदू धर्म शास्त्री व पुराणों में विशेष महत्व बताया गया है।
नीलकंठेश्वर मंदिर जिले प्रमुख शिव मंदिरों में विशेष स्थान रखता है। हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। साल भर यहा पर धार्मिक कार्यक्रमों की धूम बनी रहती है। महाशिव रात्रि के दिन जन सैलाब उमड़ता है।-सुनील नामदेव
भगवान नीलकंठेश्वर मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। विभाग बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता है। कई सालों से रंगाई -पुताई नहीं हुई है। इस ओर विभागीय अधिकारियों ध्यान देना चाहिए।- आशीष चौरसिया
नीलकंठेश्वर मंदिर पर साल भर हजारों पर्यटकों आना जाना रहता है। बरसात के दिनों में सीढ़ियों के दोनों ओर पानी बहता है जो प्राकृतिक सौंदर्य लगता है लेकिन यहां पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। प्रशांत साहू