अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। आर्यिका सृष्टि भूषण माता ने कहा कि बच्चों को संस्कार देकर भगवान पंच परमेष्ठि का स्वरूप बताना चाहिए। फूल के समान महकना या कांटा बन कर चुभन देना इनके सुख या दुख हमारे साथ होते हैं, इनका अनुभव हमारी भावना पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि जितनी उम्र बढ़ती जाती है, आप उतने ही मृत्यु के नजदीक होते जाते हैं। मैचिंग ही करना है तो परमात्मा से करो। वह बृहस्पतिवार को धर्मसभा को संबोधित कर रही थीं।
आर्यिका श्री ने कहा कि बच्चों को ससुराल भेजने के पहले कल्याणी बनाकर भेजो। शास्त्रों का अध्ययन स्वाध्याय कराओ तब ससुराल स्वर्ग हो जाएगा। जिन व्यसन को करने के लिए आप बच्चों को मना करते हैं, वही व्यसन आप करते हैं तो बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ता है। मित्रों और धर्म सभा में दिल खोलकर हंसने से एक दिन औजारों से अस्पताल में दिल खोलने की नौबत नहीं आएगी। उन्होंने बताया कि इंसान हाड़, मांस, लहू की एक इमारत है, जिसमें लहू गारा, मिट्टी है। ईंट हड्डी है, और चंद सांसों पर यह ढांचा टिका है। आदमी एक अंतर्देशी लिफाफा है, जिसे तीन बार मोड़ा जाता है, उसी प्रकार बचपन की लहरें हैं, जवानी का नजारा है और बुढ़ापे में लकड़ी हाथ में है और अंत में चिता में अंगारे हैं।
व्यक्ति को कहते हैं कि वह भगवान को प्यारा हो गया। जिसने जिंदगी भर भगवान से प्यार नहीं किया तो वह भगवान का प्यारा कैसे हो गया। अंधे रास्ता नहीं बता सकते हैं, बीमार इलाज नहीं कर सकते हैं, किंतु आप बच्चों को संस्कार देकर उनका जीवन अच्छा बना सकते हैं। धर्मसभा का शुभारंभ मंगलाचरण और आचार्य विद्या सागर एवं आचार्य विद्या भूषण सन्मति सागर के चित्र समक्ष दीप प्रज्वलन कर अतिथियों ने किया और महिला मंडल ने जिनवाणी भेंट की। आर्यिका संघ के सानिध्य में प्रवचन के साथ शाम को गुरु भक्ति में भी काफी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।