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लॉकडाउन के चलते बदल दी सदियों पुरानी परंपरा

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कैप्सन- पवित्र बेतवा नदी में अस्थियां विसर्जित करते परिजन - फोटो : TALDEHATE
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तालबेहट/कड़ेसराकलां। कोरोना वायरस के चलते जहां लोगों को घरों में रहना पड़ रहा है, वहीं लोगों को ऐसे कदम उठाने पड़ रहे है, जिससे वर्षोँ पुरानी परंपरा टूट रही है। नगर के एक परिवार ने अपनी मां की अस्थियों को इलाहाबाद संगम के स्थान पर पवित्र बेतवा में विसर्जित करके एक नई परंपरा की शुरूआत की है। इसका लोगों ने स्वागत किया है।
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कोरोना वायरस के चलते देश में तीन मई तक लॉकडाउन बढ़ा दिया गया है। लॉकडाउन के चलते हवाई, रेल और बस सेवाएं पूरी तरह से बंद हैं। कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए लोगों को अपने- अपने घरों में रहने के निर्देश दिए गए हैं। इसके चलते बाजार, मॉल, स्कूलों को बंद कर दिया गया है। देश के कई प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर लोगों के प्रवेश पर पाबंदी लगाई गई है। इसके चलते सदियों पुरानी परंपरा टूट गई हैं।
लोगों की मृत्यु होने पर उनकी अंतिम क्रिया में कम से कम लोगों के जाने के निर्देश हैं। लॉकडाउन के बाद मृत लोगों की अस्थियां कई परिवारों में अभी भी प्रयागराज में संगम स्थल पर विसर्जित करने के लिए घरों पर रखी हैं। लोग लॉकडाउन के खुलने और आवागमन के साधन चलने का इंतजार कर रहे हैं।
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दूसरी ओर, नगर के हटवारा निवासी सुशील बिलगैंया ने अपनी माताजी रामरती का निधन होने पर उनकी अस्थियों को इलाहाबाद में संगम में विसर्जित नहीं करके पवित्र बेतवा नदी में मंत्रोच्चार के मध्य विसर्जित कर नई परंपरा शुरू की है। इससे क्षेत्र में चली आ रही सदियों पुरानी परंपरा टूट गई। इस कार्य को संपन्न कराने वाले आचार्य रमेश प्रसाद अग्निहोत्री ने बताया कि सभी नदियां पवित्र हैं। इस परंपरा से दु:खी परिवार को अपने अगले कार्यक्रम करने में आसानी हो जाएगी।
बेतवा नदी के महत्व का वर्णन महाकवि कलिदास ने गंगा, नर्मदा आदि नदियों के साथ किया है। सत्तर वर्ष में पहली बार बेतवा में अस्थि विसर्जन देखा है। यह अच्छी परंपरा है।
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- जगदीश प्रसाद, प्रवक्ता
बेतवा नदी भी पवित्र नदी है। अस्थियां विसर्जन वैसे संगम में होना चाहिए, परंतु वर्तमान हालात में बेतवा में विसर्जन अच्छी बात है।
- रज्जन तिवारी, ग्राम कड़ेसराकलां

कैप्सन- बेतवा में अस्थियां विसर्जित करते परिजन- फोटो : TALDEHATE

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