मड़ावरा। तहसील मुख्यालय मड़ावरा से 15 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में ग्राम बढ़वार और गर्रोलीमाफ के बीच कुटिहार में प्राचीन सिद्ध क्षेत्र जिसे महादेवकुंड आश्रम है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होने के साथ-साथ लोगों की अटूट आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां नदी के बीच विराजे भगवान भोले नाथ का स्वरूप तिल-तिल करके बढ़ रहा है। भगवान शिव जिस अर्जुन (कवा) के पेड़ से प्रकट हुए थे, वह पेड़ आज आज भी नदी के पानी में जस का तस पड़ा है।
कुटी हार परिसर में तीन सौ वर्ष से अधिक पुराना दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर है। इसके नवीनीकरण का काम ग्रामीणों द्वारा कराया जा रहा है। इसी मंदिर के नजदीक बंडई नदी के तट पर पार्वती मंदिर है। परिसर की पूर्व दिशा में श्रीशनिदेव महाराज का प्राचीन चबूतरा बना है, यहां पर क्षेत्रीय लोगों की आस्था है। महादेव कुंड के जल की बड़ी मान्यता है। यहां पर वर्ष के किसी भी मौसम में जल सूखता नहीं है, चाहे कितनी भी भीषण गर्मी क्यों न हो। किसान दूरदराज से यहां पहुंचकर कुंड का जल ले जाते हैं और खेतों में छिड़काव करते हैं। किसानों का मानना है कि इससे कीट-पतंगे फसलों में नुकसान नहीं पहुंचाते।
महादेव कुंड आश्रम के बारे में कहा जाता है कि आश्रम से 22 किलोमीटर दूरी पर स्थित सिद्ध क्षेत्र पांडव वन धाम पर लगभग 17 वीं शताब्दी में मंदिर की पूजा अर्चन करने के लिए संत अमरदास रहते थे। जिन्हें भगवान शिव ने रात्रि में स्वप्न दिया था कि वे ग्राम गर्रोलीमाफ के मध्य स्थित कुटीहार में जाकर में बंडई नदी के तट पर खड़े कवा (अर्जुन) के पेड़ में अदृश्य रूप में स्थापित हैं और अब प्रकट होना चाहते हैं। जब संत अमरदास उक्त स्थान पर पहुंचे और ग्रामीणों को स्वप्न के बारे में बताया तो लोगों को यकीन नहीं हुआ, फिर भी संत के बताए स्थान पर गांव के लोगों ने यज्ञ और हवन किया। जैसे ही कवा के पेड़ को काटा गया, शंकर भगवान पिंडी के रूप में दिखाई दिए।
लोगों ने शंका समाधान के लिए कवा के पेड़ को वहां से हटाया, तब लगभग पांच फीट गहराई तक शिव पिंडी निकलती गई। उसे बाद में चबूतरा निर्माण के साथ प्रतिष्ठित किया गया। जो अब भी मौजूद है और धीरे- धीरे पिंडी का आकार स्वत: बढ़ रहा है।
प्रत्येक वर्ष बरसात के मौसम में बंडई नदी पूरे वेग के साथ उफान पर होती है। ऐसे में वर्षों का समय बीत जाने के बाद भी महादेव कुंड के पास अब भी वह अर्जुन (कवा) का सूखा पेड़ पानी में पड़ा है। इस पेड़ में करीब तीन शताब्दी पहले भगवान शिव की पिंडी निकली थी। पहले यहां पर महाशिवरात्रि पर मेला लगता था, आसपास और दूरदराज के लोग बड़ी संख्या में आते थे। लेकिन, अब मेला बंद हो गया है। फिर भी आस्थावान महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को जल अर्पण करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं।
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रास्ता है कंकरीला- पथरीला
भगवान शिव के दर्शन करने के लिए पगडंडियों के सहारे जाना पड़ता है। यह क्षेत्र तहसील मड़ावरा से 15 किलोमीटर और ग्राम गिरार से पांच किलोमीटर दूर है। रास्ता कंकरीला और पथरीला है। बेहतर रास्ता नहीं होने के कारण पर्यटक यहां तक नहीं पहुंच पातें। श्रद्धालुओं के लिए यहां न तो पानी की व्यवस्था है और न बिजली की। यहां पर ठहरने का भी कोई साधन नहीं है।
कुटी हार का प्राचीन शिव स्थल कौतुहल का विषय बना हुआ है। यहां पर भगवान शिव की प्रतिमा स्वत: अपना आकार बढ़ा रही है।
- इमरत प्रसाद पाराशर, पुजारी
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भगवान शिव की पिंडी जहां नदी में स्थापित है, वहां पास में ही जल कुंड है। जलकुंड का जल कभी खाली नहीं होता। इस पानी के प्रति बड़ी आस्था है।
- घूमन सिंह यादव, ग्राम गर्रोलीमाफ
पुरातत्व विभाग इस क्षेत्र पर ध्यान दे तो यह पर्यटन से आय का बड़ा माध्यम बन सकता है। यहां पर आने- जाने के लिए पक्का मार्ग बनना जरूरी है। बरसात में यहां तक पहुंचना बहुत कठिन है।
-लट्टू सिंह लोधी, ग्राम बढ़वार
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