शहर का गोविंद सागर बांध अपनी स्वचालित साइफन प्रणाली के कारण देश में विशेेष पहचान बनाए हुए हैं, लेकिन यह अव्यवस्थाओं के चलते अपने ही शहर में पहचान खोता जा रहा है। यहां पर न तो मनोरंजन के कोई साधन हैं और न ही कोई आकर्षण। बांध की तलहटी पर बनाए गए पार्क व कैंटीन विभागीय उदासीनता के चलते अपना अस्तित्व खो चुकी है।
गोविंद सागर बांध का निर्माण सन 1952 में हुआ था। इन 64 वर्षों में बांध का विकास नहीं हो सका है। बांध बनाते समय इसमें स्वचालित प्रणाली का साइफन का निर्माण कराया गया था। इसी को देखने की चाह लोगों को बांध की ओर खींच लाती है। इसके अलावा प्रशासन व सिंचाई विभाग इन 64 वर्षों में बांध को ऐसा कुछ नहीं दे पाया है, जिससे यह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सके। पहले तो स्थानीय लोग यहां पर अपने परिवार के साथ कभी कभार यहां पिकनिक मनाने के लिए आ ही जाते थे, लेकिन अब यहां ऐसा कुछ देखने को नहीं मिलता है। यह बांध अब केवल सुबह के समय आस-पास के लोगों के टहलने की जगह बनकर ही रह गया है।
पूरे बांध पर कहीं पर भी मार्ग प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं है। शाम होते ही पूरे बांध पर अंधेरा छा जाता है। बांध के मार्ग पर रात में प्रकाश की व्यवस्था के लिए स्ट्रीट लाइट लगाई जानी थी। इसके लिए विभाग ने लाखों रुपये खर्च करके वर्षों पहले मार्ग पर हर सौ मीटर पर एक खंभा लगाया था, लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी अब तक इन खंभों पर लाइट नहीं लग सकी है। शाम होते ही पूरा बांध अंधेरे में डूब जाता है। सुरक्षा के लिए भी जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन द्वारा कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। यहां पर नहाते समय कई युवक डूबकर मर गए हैं। इसके अलावा पूर्व में यहां पर कई हत्याएं हो चुकी हैं। किसी घटना के बाद पुलिस कर्मियों की ड्यूटी यहां पर लगा दी जाती है, लेकिन समय बीतते ही सब पुराने जैसा हो जाता है। वहीं बांध के साइफन पर रैलिंग भी गायब हो चुकी है, जिसकी मरम्मत नहीं की गई।
केवल कागजों पर बचा पार्क
बांध पर मनोरंजन के लिए सिंचाई विभाग द्वारा करीब सात-आठ वर्ष पूर्व लाखों रुपये की लागत से पार्क बनाया था। इसमें बैठने की व्यवस्था, फुव्वारा के साथ-साथ बच्चों के लिए झूले लगाए थे। कैंटीन का भी निर्माण कराया गया था। लेकिन रखरखाव व सुरक्षा के अभाव में यह पार्क अब अपना अस्तित्व खो चुका है। अब यहां पर केवल पार्क के कुछ अवशेष ही शेष रह गए है, पार्क की दीवारें तक गायब हो गई हैं। इसका जिम्मेदार कोई ओर नहीं स्वयं ही सिंचाई विभाग है। पार्क की सुरक्षा के चौकीदार और फुलवारी के रखरखाव के लिए माली की तैनाती की गई थी, लेकिन इसके बावजूद वह पार्क को बचा नहीं पाए। वर्तमान में भी बांध का यह पार्क विभागीय कागजों पर सुरक्षित है। जबकि हकीकत में पार्क की सुरक्षा व रखरखाव के लिए तैनात कर्मचारी अधिकारी की सेवा व कार्यालय के रखरखाव में लगे हुए हैं।
सड़क पर लग रहे सवालिया निशान
बांध के साइफन और गेट देखने के लिए आने वाले लोगों के लिए बांध के बंध पर करीब साढ़े तीन किलोमीटर का मार्ग बना हुआ है, जो बीते कई वर्षों से जर्जर हालत में था। वर्षों बाद सिंचाई विभाग द्वारा इस सड़क का निर्माण कराया जा रहा है। सड़क निर्माण में मानकों की अनदेखी का आरोप लग रहा है। आरोप है कि कार्यदायी संस्था द्वारा गिट्टी में बांध की मिट्टी मिलाकर सड़क पर बने गड्ढों को भरा जा रहा है और फिर इस पर केवल कोलतार मिक्स बारीक गिट्टी की लेयर डाली जा रही है। इस सड़क की गुणवत्ता की सुधार को लेकर पूर्व में कई संगठन प्रशासन को ज्ञापन सौंप चुके हैं और जांच कराने की मांग की है।
40 लाख कम में हुआ टेंडर
सिंचाई विभाग के राजघाट निर्माण खंड के अधिशासी अभियंता अतुल गुप्ता ने बताया कि बांध के बंध पर डाली जा रही इस सड़क के निर्माण का ठेका विभाग द्वारा तैयार किए गए स्टीमेट से 40 लाख रुपये कम में हुआ है। विभाग द्वारा इस सड़क निर्माण के लिए कुल 2.02 करोड़ रुपये का स्टीमेट तैयार किया गया था। ओपिन टेंडर प्रक्रिया में ठेकेदार ने सड़क निर्माण का ठेका 1.60 करोड़ रुपये में लिया है। वहीं उन्होंने बताया कि शासन से सड़क निर्माण के लिए 2.02 करोड़ रुपए अवमुक्त हुआ है, जिसके चलते विभागीय चीफ से अनुमति लेकर बांध की तलहटी पर सीतापाठ कुंड से लेकर बांध के गेटों तक शेष बची 40 लाख रुपए की धनराशि से सड़क का निर्माण कराया जा रहा है। शिकायतों की जांच की जाएगी।