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जेेनेटिक रोग है ग्लैंडर्स - फार्सी, मनुष्यों में भी संक्रमण का खतरा

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ग्लैन्डर्स एवं फ़ार्सी रोग पर आयोजित कार्यशाला में उपस्थित मुख्य विकास अधिकारी अनिल कुमार पांड? - फोटो : LALITPUR
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ललितपुर। ग्लैंडर्स एवं फार्सी सर्विलियंस के अंतर्गत प्रशिक्षण का आयोजन विकास भवन सभागार में किया गया।
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शुभारंभ मुख्य विकास अधिकारी अनिल कुमार पांडेय ने किया। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि ग्लैंडर्स- फार्सी बहुत ही पुरानी बीमारी है, यह एक सांसर्गिक (कंटेजियस) रोग है। वर्तमान में इस रोग का विश्व के अधिकतर देशों में उन्मूलन कर दिया गया है। यह रोग प्रमुख रूप से अश्वकुल (इक्वाइन) के पशुओं जैसे घोड़े, खच्चर, टट्टू और गधा आदि में पाया जाता है। यह रोग जेनेटिक प्रकृति का है। यह उन मनुष्यों में भी फैल सकता है, जो इसके संपर्क में आते हैं या अस्तबल में रोजाना काम करते हैं। कार्यशाला में बताया गया कि इस रोग में घोड़े के फेफड़ों में गांठें पड़ जाती हैं। घोड़े कभी खुले घावों के साथ हफ्तों व महीनों तक कार्य कर जीवित रहते हैं और रोग का निरंतर फैलाव करते हैं। इनमें एक्यूट ब्राकों निमोनिया के सभी लक्षण होते है, जैसे तेज ज्वर, स्वास्थ्य में गिरावट, तेज स्वांस का चलना, जिसके चलते कुछ ही हफ्तों में मृत्यु हो जाती है। यह रोग गधों और खच्चरों में फार्सी सहित पाया जाता है। रोग का शीघ्र निदान और पशुओं के अस्तबल, लगाम व जीन का जीवाणुनाशक घोल से विसंक्रमण बचने का प्रमुख आधार है। भारत में अब तक इस रोग से संक्रमित कोई व्यक्ति नहीं पाया गया है, परंतु इसका खतरा बना रहता है।
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कार्यशाला में समस्त पशु धन प्रसार अधिकारी, उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, पशु चिकित्सा अधिकारी बांसी एवं वेटनरी फार्मासिस्ट और अन्य कर्मचारी उपस्थित रहे।
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