ललितपुर। तीन साल से लगातार दैवीय आपदा का शिकार जनपद का किसान मुआवजे की आस लगाए हुए है। मंगलवार को केंद्र सरकार द्वारा पिछले वर्ष रबी की फसल का नुकसान मुआवजा योग्य न मानते हुए झांसी व ललितपुर को राहत राशि की सूची से बाहर कर दिया। यह खबर मिलते ही जनपद के किसानों में रोष है। इसका असर बुधवार को कलक्ट्रेट सभागार में आयोजित किसान दिवस का किसानों द्वारा विरोध करके व नारेबाजी कर प्रदर्शन में दिखा।
किसानों का कहना है कि अगर इस बार सूखा नहीं पड़ा और किसानों को कोई नुकसान नहीं हुआ तो फिर उनके खेतों में फसल क्यों नहीं हुई। जनपद में करीब आठ साल बाद पड़े भीषण सूखे ने किसानों के साथ आमलोगों के जीवन को बेहाल कर दिया था। फसल के लिए पानी तो दूर की बात रही, पेयजल के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर तक सफर करना पड़ा। इन सब स्थितियों के बावजूद केंद्रीय दल व राज्य स्तरीय अधिकारियों के जांच दल ने जनपद में सूखे के असर की जो रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें जनपद में 10 से 25 फीसदी ही नुकसान माना गया।
जबकि केंद्र सरकार के मुआवजे के नियमों के मुताबिक यह नुकसान 33 फीसदी तक होना चाहिए। सूखे का असर यह रहा कि कई किसानों ने केवल अपने खाने योग्य अनाज पैदा करने के लिए ही खेती की। प्रशासन के आंकड़ों की मानें तो इस बार रबी की फसल को कुल 1 लाख 70 हजार 911 हेक्टेयर में बोया गया था। जबकि 97 हजार 937 हेक्टेयर जमीन पानी के अभाव में खाली पड़ी रही। इतनी बड़ी तादाद में खेतों के खाली पड़े होने का कारण सूखे की विभीषिका ही थी।
इसके बावजूद मुआवजा न मिलना किसानों के लिए दुखदायी साबित हो रहा है। हालांकि जिला प्रशासन की ओर से खाली पड़े खेतों को शतप्रतिशत क्षतिपूर्ति मानकर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेजी थी। लेकिन अभी तक 97 हजार 937 हेक्टेयर खाली पड़े खेतों के मालिकों के लिए केवल 6 लाख रुपए ही बीमा राशि भेजी गई है। जो कि ऊंट के मुंह में जीरा भी साबित नहीं हुई।केंद्र सरकार को भले ही जनपद में सूखा न दिखे, लेकिन गेहूं की सरकारी खरीद का आंकड़ा सूखे को जगजाहिर कर रहा है। जहां पिछले वर्ष जनपद में गेंहू की सरकारी खरीद 5 लाख 7 हजार कुंतल रही थी, वहीं सूखे के कारण इस वर्ष गिरकर 2 लाख 56 हजार पर पहुंच गई। करीब 50 फीसदी गेहूं की खरीद में फर्क आना फसल की बर्बादी की कहानी बयां करता है।
चारों तरफ था हाहाकार
जून महीने के पहले तक जनपद के तकरीबन हर हिस्से में सूखे के कारण हाहाकार की स्थिति बनी हुई थी। बार, तालबेहट, मड़ावरा, महरौनी ब्लॉक के कई हिस्सों में सिंचाई का पानी न होने के कारण खेती खाली पड़े रहे। काम न होने पर कई गांवों से सैकड़ों की तादाद में लोग पलायन कर गए। जनपद में तथाकथित घास की रोटी खाने की खबर राष्ट्रीय मीडिया में चलने पर खुद मुख्यमंत्री को उस गांव लड़वारी का दौरा करना पड़ा था, जहां के निवासी कथित तौर पर घास की रोटी खा रहे थे। पेयजल के लिए समाजवादी टैंकर चलाए गए, विशेष तौर हैंडपंपों को लगाया गया। सूखे से निपटने इतनी सारी कवायद होने के बाद भी फसल पर सूखे का असर न होना समझ से परे है। बालाबेहट क्षेत्र में हजारों लोग झरने के पानी पर निर्भर रहे।
मौत को लगाया गले
फसल नुकसान के कारण सूखे कई किसानों ने फसल बर्बाद देख मौत को गले लगा लिया। जिला मुख्यालय से 12 किमी दूर स्थित ग्राम खड़ोवरा में एक साल आठ महीने में सूखे के कहर के चलते बाप-बेटे को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। ग्राम खड़ोवरा निवासी जंडैल सिंह ने जून 2014 में फसल खराब होने व कर्ज के चलते आत्महत्या कर ली थी। पिता की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहा बड़े पुत्र ने कर्ज लेकर रबी की फसल को बोया, लेकिन सालों पहली बार ऐसा हुआ कि गोविंद सागर बांध में पानी न होने के कारण नहरों का संचालन ठप रहा और फसल खराब हो गई। फसल खराब होने व बढ़ते कर्ज के चलते गजेंद्र भी जिंदगी की जंग हार गया और फरवरी 2016 को उसने भी फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह उदाहरण है, कि सूखे ने जनपद में कितना कहर बरपाया। वहीं, दर्जन भर से ज्यादा किसानों की मौतें खेतों पर सदमे के चलते हुई।