अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध आज भी देशवासियों को याद है। इस लड़ाई में सेना ने 13 दिनों में पाकिस्तान की सेना को धूल चटा दी थी, तभी से 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है। इस लड़ाई में शामिल रहे दो फौजियों से बात की गई तो उनकी यादें ताजा हो गईं। 0000
शादी छोड़ भागे थे युद्ध के लिए : सन् 1971 में भारत-पाक के बीच हुए युद्ध को याद करते हुए महरौनी तहसील के किसरदा गांव में रहने वाले सेवानिवृत नायब सूबेदार हनुमंत प्रसाद तिवारी ने बताया कि देश सेवा का प्रण लेते हुए वर्ष 1967 में भारतीय सेना की 17 पैरा फील्ड रेजिमेंट में भर्ती हुआ। सबसे पहले शिमला के पुआरी सेक्टर में तैनाती मिली। इसके बाद आगरा आ गया। नवंबर 1971 में 28 दिन की छुट्टी मिली तो घर आ गया। इस बीच दो दिसंबर को शादी होना निश्चित हुआ था। घर में शादी की सभी तैयारी शुरू हो गई थी। दो दिन पूर्व भारत-पाक युद्ध की जानकारी मिली तो तुरंत शादी छोड़ युद्ध के लिए रवाना हो गए। इससे परिवार के साथ ससुराल में हलचल मच गई। युद्ध के दौरान उनकी पैरा ब्रिगेड ने पैराशूट से उतरते ही दुश्मन को उन्हीं के इलाके में काले चीतों की तरह झपट लिया था। अचानक हुई इस कार्रवाई से दुश्मन के हाथ पांव फूल गए और उन्हें आत्मसमर्पण के लिए विवश होना पड़ा था। भारत-पाक युद्ध 3 दिसंबर 1971 को शुरू होकर 16 दिसंबर तक चला था। 13 दिन चले युद्ध में पाक के 93 हजार सैनिकों को कैद किया गया था।
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युद्ध के दौरान बॉर्डर पर जवानों तक गोला बारूद पहुंचाई
असम रायफल्स के सेवानिवृत नायक बलराम सिंह ने बताया कि भारत और पाक के बीच युद्ध शुरू होते ही उनकी बटालियन को दो हिस्सों में कर दिया गया था। एक हिस्सा बांग्लादेश सीमा पर पहुंच गया, जबकि उनकी टुकड़ी को गोला बारूद पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई थी। देश की खातिर घर परिवार की चिंता किए बगैर जवान दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। कई बार ऐसी स्थिति आई कि गोली पास से निकल गई, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। परिवार में छोटे बच्चों के साथ पत्नी भी देश सेवा के लिए प्रेरित करती रहीं।
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युद्ध के दौरान परिवार को बंकर में छुपने के थे निर्देश
नायक बलराम सिंह के पुत्र नायक सूबेदार उमेश कुमार सिंह ने बताया कि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1971 की लड़ाई के दौरान आदेश थे कि यदि लड़ाकू विमान की आवाज सुनें तो तत्काल घर के आसपास बनाए गए बंकरों में सभी लोग छुप जाएं। लड़ाई के दौरान मां के साथ कई बार रात में जगते रहते थे। उस लड़ाई में भारतीय सेना की जीत का जश्न मनाते देखा तो सेना में शामिल होने का संकल्प लिया। आज वह सेना से सेवानिवृत हो गए हैं।
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वर्ष 1971 में भारतीय सेना के जवानों ने जिस साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तान की सेना को करारी शिकस्त दी थी, उसी विजय दिवस के उपलक्ष्य में सोमवार को जिला सैनिक कार्यालय में भूतपूर्व सैनिकों व शहीदों की पत्नियों को सम्मानित किया जाएगा।-नायब सूबेदार वीरेंद्र सिंह, जिला सैनिक कल्याण अधिकारी