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विपरीत हालात में भी न खोएं संयम: ओंकारानंद महाराज

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संवाद न्यूज एजेंसी
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डोंगराखुर्द (ललितपुर)। प्रयाग पीठाधीश्वर जगत गुरु शंकराचार्य स्वामी ओंकारानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि प्रभु श्री राम के गुणों की जितनी व्याख्या की जाए कम है। उन्होंने मर्यादाओं को हमेशा उच्च स्थान दिया है। इसलिए भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से भी जाना जाता है। वह बचपन से ही शांत स्वभाव के थे। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान राम के जन्म के बाद उनका नाम दशरथ राघव रखा गया था, जो कि मनुष्य के मन की आत्मा को शक्ति प्रदान करता है। महर्षि वशिष्ठ ने महाराज दशरथ के पुत्रों के नाम राम, भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण रखा था।
कस्बा नाराहट में नौ दिवसीय श्रीराम कथा महोत्सव में चौथे दिन स्वामी ओंकारानंद ने कहा कि भगवान राम ने धैर्य और साहस से जीवन जीने का उदाहरण पेश किया है। उनके जीवन से पता चलता है कि व्यक्ति को हमेशा विपरीत परिस्थितियों में संयम नहीं खोना चाहिए। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने के बाद श्रीराम अपने भाईयों के साथ वापस अयोध्या आते हैं। दूसरे दिन महाराज दशरथ कुल गुरु वशिष्ठ के सानिध्य में श्रीराम को अयोध्या का राज देने पर मंत्री सुमंत व पुरवासियों से विचार विमर्श कर रहे थे, तभी ऋषि विश्वामित्र के आने की सूचना द्वारपालों ने महाराज दशरथ को दी।
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विश्वामित्र ने कहा कि हे राजन अपने दोनों बालक मेरे साथ यज्ञ की रक्षा के लिए भेजें। महाराज दशरथ ने गुरु वशिष्ठ के आदेशानुसार दोनों पुत्रों को विश्वामित्र के साथ यज्ञ की रक्षा के लिए भेज दिया। रास्ते में राम लक्ष्मण ने एक शिला को देखा। विश्वामित्र ने बताया कि गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी को श्राप देकर पत्थर बना दिया। वर्षों से यह शिला आपके चरण रज को चाहती है। विश्वामित्र के इतना कहते ही राम ने पत्थर को अपने चरण से स्पर्श किया और अहिल्या प्रकट हो गईं। ऋषि ने बताया कि ताड़का राक्षसी वन में कहीं विश्राम करती है, जिसके बाद श्रीराम ने अपने धनुष का टंकार किया। धनुष की टंकार सुन राक्षसी ताड़का उठकर विश्वामित्र पर जैसी ही झपटी तत्काल प्रभु राम और लक्ष्मण ने अपने बाणों से राक्षसी ताड़का का वध कर डाला।
श्रद्धालुओं के जय श्रीराम घोष से कथा स्थल गुंजायमान हो गया। इस अवसर पर कृष्ण सखा उद्धव महाराज, मंत्री प्रतिनिधि सुरेश पंथ, हरेंद्र शाह राजू राजा प्रधान, दीपक राजा, प्रमोद पाठक, बब्लू दीक्षित, प्रदीप दुबे, जिला पंचायत सदस्य मनोज कुशवाहा आदि मौजूद रहे।
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डुंगरासन माई के दर्शन कर विश्व के कल्याण की कामना की
डोंगराखुर्द। प्रयाग पीठाधीश्वर ओंकारानंद महाराज डोंगराखुर्द पहुंचे और करीब एक हजार फीट ऊंचे विंन्ध्याचल पर्वत पर बिराजमान डंगरासन माता मंदिर में जाकर पूजन अर्चन किया। उन्होंने माता रानी से विश्व कल्याण की कामना करते हुए भजन कीर्तन किया। उन्होंने बताया कि डुंगरासन माई की प्रतिमा प्राचीन है। माई का स्मरण करने मात्र से लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं। माता रानी के नाम से इस ग्राम का नाम डोंगराखुर्द पड़ा। सभी को सनातन धर्म की रक्षा करनी चाहिए। इस दौरान आचार्य महेंद्र त्रिपाठी, लोकेंद्र सिंह बुंदेला, विक्रम शाह राव साहब, भूप्रताप सिंह, गिरिराज शरण रावत, छोटू त्रिपाठी, रामनारायण तिवारी, अखिलेश यादव आदि मौजूद रहे। संवाद
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