ललितपुर।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय परिसर में बनाए जा रहे सीएमओ कार्यालय
निर्माण में विलंब पर शासन ने गंभीर रुख अपना लिया है। प्रमुख सचिव ने
कार्यदायी संस्था को तीन महीने में भवन पूर्ण करने के निर्देश दिए हैं, साथ
ही संस्था की ओर से प्रस्तुत किए गए पुनरीक्षित लागत के प्रस्ताव पर विचार
करने से इंकार कर दिया है।
कार्यदायी संस्था पैक्सफेड ने मार्च 2012
में सीएमओ कार्यालय परिसर में 1,51,18,000 रुपये की लागत से मुख्य चिकित्सा
अधिकारी कार्यालय का निर्माण शुरू किया था। अनुबंध के मुताबिक कार्यालय का
निर्माण जून 2013 में पूर्ण होना था, लेकिन जून 2015 बीतने के बाद भी
कार्य पूर्ण नहीं हो सका है। कार्यालय के मद में जारी किए गए 149.77 करोड़
रुपये व्यय किए जाने के बाद भी कार्यालय में कमियों का अंबार लगा हुआ है।
निर्धारित अवधि में कार्य पूर्ण न किए जाने पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने
जहां 6,43,714 रुपये की पेनल्टी निर्धारित कर दी है। वहीं, सीएमओ की
रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश शासन के प्रमुख सचिव अरविंद
कुमार ने उत्तर प्रदेश विधायन और निर्माण सहकारी संघ लिमिटेड (पैक्सफेड)
लखनऊ के प्रबंध निदेशक को पत्र लिखकर तीन महीने में भवन निर्माण पूर्ण करके
विभाग को हस्तगत कराने के निर्देश दे दिए हैं। साथ ही, कार्यदायी संस्था
की ओर से प्रस्तुत की पुनरीक्षित लागत पर विचार करने से साफ इंकार कर दिया
है। गौरतलब है कि अमर उजाला ने तीन जुलाई के अंक में पेज नंबर पांच पर दो
वर्ष बाद भी नहीं बना सीएमओ कार्यालय नामक खबर को प्रमुखता से प्रकाशित
किया था।
बाक्स
पड़ सकता है पैक्सफेड को कार्य आवंटन पर असर
प्रमुख
सचिव की ओर से जारी पत्र में स्पष्ट किया गया है कि निर्माण कार्य में
लेटलतीफी का असर पैक्सफेड को भविष्य में आवंटित होने पर कार्यों पर भी पड़
सकता है, क्योंकि निर्माण कार्य में हुए विलंब के लिए कार्यदायी संस्था के
स्तर पर ही शिथिलता और अनियमितता बरती गई है। भविष्य में निर्माण कार्य
आवंटित होने से पूर्व इस कार्य में व्याप्त कमियों को पूर्ण करके भवन
हस्तगत कराने के निर्देश दिए गए हैं।
पैक्सफेड ने की थी 83 लाख रुपये पुनरीक्षित लागत की मांग
परियोजना
अभियंता पैक्सफेड निर्माण प्रखंड झांसी संतोष कुमार पांडेय ने स्वास्थ्य
विभाग से पुनरीक्षित आगणन वर्कडन एंड वर्क टूबीडन के आधार पर 83 लाख एक
हजार रुपये अतिरिक्त पुनरीक्षित लागत की मांग की थी, जिस पर शासन ने विचार
करने से इंकार कर दिया है।