संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। रासायनिक रंगों की बाजार में खूब बिक्री होती है, लेकिन ये रंग शरीर के लिए काफी नुकसानदायक हैं। वहीं, भोजन में चला जाए तो वह भी जहरीला हो जाता है। पुराने लोग अब भी फूलों से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं।
होलिका दहन के अगले दो दिनों तक होली खेली जाती है। दो दशक पहले तक बुंदेलखंड में होली का पर्व फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से खेलने का चलन था। इन रंगों को बनाने में टेसू के फूल, सुगंधित बनाने के लिए बेला, चमेली और गुलाब का उपयोग किया जाता था। साथ ही सिंघाड़े के आटे से गुलाल बनाकर अबीर के साथ होली खेलने की परंपरा रही है।
कई मंदिरों में इन्हीं फूलों से बने रंगों से होली खेलने का चलन अब भी है। लेकिन बदलते युग में रासायनिक रंग का उपयोग तेजी से बढ़ा है। इनके उपयोग से खासकर बच्चों में त्वचा संबंधी गंभीर बीमारियां होने की आशंका रहती है।