शहर के प्राइवेट अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम, पैथोलॉजी व एक्स-रे स्टोर से निकले वाला मेडिकल वेस्ट सड़कों के किनारे व नजदीकी खुले मैदानों में फेंका जा रहा है और जलाया भी जाता है। इसमें जिला चिकित्सालय भी पीछे नहीं हैं। जिम्मेदार स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों, नगर पालिका और जिला प्रशासन द्वारा इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। इससे शहरवासियों के स्वास्थ्य, और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के अनुसार शहर क्षेत्र में एक निजी अस्पताल, पांच नर्सिंग होम, 92 क्लीनिक, 13 पैथालपॉजी सेंटर और करीब पांच एक्सरे सेंटर संचालित हैं, इसके अलावा अवैध क्लीनिक भी हैं। इन मेडिकल सेंटरों से निकलने वाले बायो मेडिकल वेस्ट मैटेरियल, जैसे खून, मल-मूत्र और घातक केमिकल्स से भीगे कॉटन-पट्टी से लेकर सिरिंज, दवाओं को खुले मैदानों व सड़कों के किनारे फेंका जा रहा है। वहीं, कुछ सेंटर वाले तो इस मेडिकल वेस्ट को जलाकर पर्यावरण को दूषित किया जा रहा है। शहर में खुले आम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम की धज्जियां उड़ाई जा रही है, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी, नगर पालिका और जिला प्रशासन उदासीन बना हुआ हैै। शासन के नियमानुसार यदि कोई नर्सिंग होम, अस्पताल या क्लीनिम इन नियमों का पालन नहीं करता है तो उसकी मान्यता व लाइसेंस निरस्त करने का प्रावधान है।
नगर पालिका भी बनी हुई है उदासीन
शहर में सफाई व्यवस्था को सुनिश्चित बनाए रखने की जिम्मेदारी नगर पालिका की है। लेकिन सफाई कर्मचारी इन निजी नर्सिंग होम व अस्पतालों और क्लीनिक सेंटरों से मेडिकल वेस्ट मैटेरियल उठाकर कचरे के साथ खुले मैदानों में फेंक देते हैं और जला देते हैं। नगर पालिका के दो मुख्य सफाई निरीक्षक और हर वार्ड क्षेत्र में स्वास्थ्य नायक तैनात है, जिनकी जिम्मेदारी केवल शहर में सफाई व्यवस्था को बनाए रखने की है। लेकिन इन जिम्मेदार कर्मियों और निरीक्षकों द्वारा कभी भी खुले में फेंके जाने वाले चिकित्सीय कचरे पर आपत्ति नहीं उठाई है और न ही कोई कार्रवाई की है। जबकि शहर में गंदगी फैलाने वालों और कचरा जलाने वालों पर जुर्माना लगाने का अधिकारी नगर पालिका के पास है।
जिला अस्पताल नियमों की धज्जियां उड़ाने में अव्वल
ललितपुर। बायो मेडिकल वेस्ट के निस्तरण की धज्जियां उड़ाने में जिला अस्पताल समस्त निजी अस्पतालों व नर्सिंग होमो को पीछे किए हुए हैं। जिला अस्पताल पुरुष व महिला दोनों का ही यह हाल है। जिला अस्पताल की पॉथोलीजी में खून की जांच, ऑपरेशन, इंजेक्शन लगना, बोतल लगना और एक्सीडेंटल केस आदि शामिल हैं। इस दौरान हर रोज भारी मात्रा में निकले वाले बायो मेडिकल वेस्ट मैटेरियल को जिला अस्पताल का प्रशासन परिसर में बने शव गृह के पास खुले मैदान व वहां रखे डस्टबिन में फेंक देता है।
वहीं, महिला जिला अस्पताल प्रशासन भी हर रोज अस्पताल में होने वाले दो दर्जन से अधिक प्रसव के दौरान निकलने वाले मेडिकल वेस्ट मैटेरियल को ट्रॉमा सेंटर के पीछे खाली पड़े मैदान में फेंककर जला देता है। इस जहरीले धुएं के संपर्क में आने से भर्ती मरीजों और आस-पास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। जिला अस्पताल के अधिकारियों को तो इस मेडिकल वेस्ट के निस्तारण के लिए प्रदूषण बोर्ड को अपनी जेब से भी पैसा नहीं देना पड़ता है, इसके बावजूद अस्पताल के अधिकारी लापरवाही बरत रहे हैं। सरकार ने मेडिकल वेस्ट मैटेरियल को खुले में फेंकने पर पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के तहत कानूनी अपराध भी माना है।
यह है निस्तारण का नियम
मेडिकल केंद्रों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट मैटेरियल के निस्तारण के लिए उत्तर-प्रदेश प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड द्वारा संस्थाएं चलाई जाती है। यह संस्था मेडिकल केंद्रों से निकलने वाले वेस्ट मैटेरियल का प्रतिदिन केंद्र से उठान करती हैं और प्लास्टिक थैली में पैक करके अपने साथ निस्तारण के लिए ले जाती है।
- हर प्रकार के वेस्ट मैटेरियल के लिए अलग रंग का बैग
पीला बैग - रोगी का कचरा, संक्रमित कचरा, प्रयोगशालाओं का कचरा, सनी हुई ड्रेसिंग
लाल बैग - संक्रमित प्लास्टिक कचरा, कैथेटर, कैनुला, सीरिंज, ट्यूब, आरबी बोतल
नीला बैग - ग्लास का टूटा सामान, ट्रेट इंजेक्शन, एक्युल स्लाइड, कांच की सीरिंज, निडिल, ब्लेड, धातु के धारदार एवं नुकीला सामान
काला बैग - पेशाब, बलगम, मवाद, संक्रमित द्रव्य, संक्रमित कपड़े, ओटी के कपड़े, लेबर रुम के कपड़े स्टोर किए जाते हैं।
यह है हानियां
खुले पड़े मेडिकल कचरे से निमोनिया, हैजा, कालरा, डेंगू, स्वाइन फ्लू, मेनेंजाइटिस, हेपेटाइटिस-बी व कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती है। इसके अलावा मवेशी भी इस चिकित्सीय कचरे को भी खा लेते हैं, इससे उनके शरीर में इंफेक्शन होता है और धीरे-धीरे वे दम तोड़ देते हैं। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान होने के साथ ही बीमारियां फैलने की आशंका है। लेकिन प्रशासन का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।