पिछले वर्ष शासन ने नगरीय पेयजल योजना के लिए जल निगम को करीब 2.80 करोड़ रुपये उपलब्ध कराए थे, जिनका विभाग के अधिकारियों द्वारा शासनादेश के विपरीत कार्य कराकर धनराशि का दुरुपयोग किया जा रहा है। जल निगम के तत्कालीन अधिशासी अभियंता ने बिना कार्य हुए एडवांस में ही ठेकेदार का 60 लाख रुपये का भुगतान कर दिया है। इस राशि से पानी की टंकियों को साफ करने के लिए एयर ब्लोअर लगाए जाने थे, लेकिन उक्त उपकरण अभी तक नहीं लगाए जा सके हैं।
शासन ने नगरवासियों को पेयजल की समस्या से निजात दिलाने के लिए वर्ष 2016 के मई माह में नगरीय पेयजल कार्यक्रम के तहत जल निगम को 2.80 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध कराया था। तत्कालीन अधिशासी अभियंता एसपी सिंह ने इस योजना के आधे से अधिक धनराशि का उपयोग शासनादेश के विपरीत व अनुपयोगी कार्यों में किया है। इस संबंध में अमर उजाला ने विगत 28 अप्रैल के अंक में ‘गलत जगह लगाए जा रहे डेढ़ करोड़’ नामक शीर्षक से खबर प्रकाशित किया था। इस दौरान अपर जिलाधिकारी योगेंद्र बहादुर सिंह ने मामले की जांच कराने की बात कही थी। मामले को एक सप्ताह से अधिक समय बीत गया है, लेकिन जिला प्रशासन द्वारा अब तक मामले की जांच तक नहीं कराई गई है। गौरतलब है कि इस धनराशि का उपयोग शासनादेश के अनुसार नगरीय क्षेत्रों में हैंडपंप लगवाने, रीबोर कराने और रीबोर योग्य नलकूपों को सुचारु कराने के कार्यों में किया जाना था, लेकिन विभाग ने इसके विपरीत व अनुपयोगी कार्य करा कर जनता के करीब 1.37 करोड़ रुपये ठिकाने लगा दिए हैं।
लाखों रुपये का हुआ एडवांस भुगतान
जल निगम में पहले तो अपनी मनमर्जी से कार्ययोजना बना ली और वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में एयर ब्लोअर लगाने का कार्य करने वाली कंपनी को विगत फरवरी माह में करीब 60 लाख रुपये का एडवांस भुगतान कर दिया है। जबकि एयर ब्लोअर अभी लगाए भी नहीं गई है। वर्तमान में यह विभाग के स्टोर की शोभा बड़ा रहे हैं। जल निगम की कार्ययोजना के अनुसार करीब 94.54 लाख रुपये की लागत से शहर के तीनों वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में एक-एक और तालबेहट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में एक एयर ब्लोअर लगाए जाने हैं, लेकिन जल संस्थान के अधिकारियों का साफ कहना है कि किसी भी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में एयर ब्लोअर लगाए ही नहीं जा सकते हैं।
यहां भी है फर्जीवाड़ा
इसके अलावा 22.50 लाख रुपए तालबेहट नल कूप को रीबोर कराकर उसको पाइप लाइन से जोड़ने का कार्य किया जाना है, जबकि वहां पर पहले से ही लाइन पड़ी है और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इसमें मात्र 2.50 लाख रुपए का ही व्यय है। साथ ही 8.40 लाख रुपए से कसाई मंडी क्षेत्र के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में 02 किलोग्राम प्रति घंटा क्षमता का गैसियस टाइप क्लोरिनेटिंग प्लांट लगाया जाना है जो शासनादेश के विपरीत है और पहले से भी लगा हुआ है। इसके अलावा शहर में करीब 10.50 लाख रुपए से कंट्रोल पैनल लगाया जाना है, जबकि कंट्रोल पैनल भी पूर्व से लगे हुए हैं।
डीएम व एडीएम पर था अंधा विश्वास
जल निगम के अधिकारियों को जिला प्रशासन पर पूरा विश्वास था कि वह उनके द्वारा बनाई गई कार्ययोजना को शतप्रतिशत स्वीकृति दे देंगे। तभी तो जल निगम के तत्कालीन अधिशासी अभियंता एसपी सिंह ने शासनादेश के विपरीत व गैर उपयोगी कार्यों में धनराशि व्यय करने की कार्ययोजना बनाई और 17 दिसंबर 2016 को उक्त कार्यों की टेंडर संबंधी सूचना भी जारी कर दी थी। इसके बाद 19 व 20 दिसंबर तक टेंडर डाले गए थे और 22 दिसंबर को टेंडर ओपिन किए गए। टेंडर प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद जल निगम ने मात्र औपचारिकता करने के लिए 22 दिसंबर को अपर जिलाधिकारी से कार्ययोजना की अनुमति ली। इसके बाद डीएम ने कार्ययोजना पर अपनी मंजूरी दी। जल निगम द्वारा पहले टेंडर प्रक्रिया पूर्ण कर लेना और बाद में जिला प्रशासन द्वारा कार्ययोजना को शत-प्रतिशत मंजूरी दे देना यह भी संदेह की स्थिति पैदा करता है।
शासन को कराया गया अवगत
इस संबंध में शासन को पत्र भेजा गया है, आगे की कार्रवाई शासन स्तर से ही होगी।
डा.रुपेश कुमार
जिलाधिकारी, ललितपुर।