ललितपुर। दीपावली के दूसरे दिन मौनी पड़वा पर ग्रामीणों द्वारा बुंदेलखंड का पारंपरिक सैरा नृत्य पेश किया गया। ग्रामीण अंचलों से आए कलाकारों ने बारह गांवों का भ्रमण कर मौन व्रत तोड़ा। पारंपरिक गणवेश धारण किए ग्रामीण कलाकारों ने कृष्ण भक्ति में मग्न होकर अपनी आस्था का जीवंत प्रदर्शन किया।
मौनी पड़वा का पर्व ग्रामीण अंचलों में धूमधाम से मनाया गया। कृष्ण और राधा की उपासना और भक्ति में सराबोर कलाकारों ने बुंदेलखंडी लोक कला का प्रदर्शन कर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। पांरपरिक वेशभूषा धारण कर मस्तक पर मोर पंख व हाथों में चाचर लेकर सैरा नृत्य करने निकली कलाकारों की टोलियों ने नगर व गांव के विभिन्न इलाकों का भ्रमण किया, वहीं मौनियों के इंतजार में नगरवासी सुबह से ही इंतजार करते नजर आए। टोली में मौजूद पच्चीस लोग छिल्ला, सिलावन, किसरदा, महरौनी, खिरिया, छायन, नैनवारा, सैदपुर, सतवांसा, साढ़ूमल, मड़ावरा, रनगांव होते हुए मध्य प्रदेश स्थित अवार माता पहुंचे। प्राचीन परंपराओं के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन भगवान श्री कृष्ण और राधा जी के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए ग्वाला, पाल, यादव वर्ग के लोग नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। इस दौरान ग्रामीण मौन व्रत धारण कर बारह गांव का भ्रमण कर सैरा नृत्य करते हैं। बृहस्पतिवार को टोली के लोग बंदर, भालू, शेर आदि की वेशभूषा में मदमस्त होकर नृत्य करते हुए दिखाई दिए। कृष्ण उपासक धनतेरस से भाईदूज तक पांच दिन मौन व्रत रखते हैं। तदोपरांत अमावस्या तथा पड़वा के दिन ये भक्तगण भगवान कृष्ण के ग्वाले का रूप धर विशेष पोशाक पहनकर तथा घुंघरू आदि बांधकर भ्रमण के लिए निकलते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन खास नृत्य कर ये मौन व्रतधारी दिवाली गीत गाते हैं। बारह गांवों का भ्रमण करने के बाद मौनी कलाकार व्रत तोड़ते हैं। ऐसी मान्यता है कि वर्षों पहले भगवान श्रीकृष्ण ने लोकनृत्य किया था। इस परंपरा व संस्कृति से जुड़े लोग निरंतर बारह वर्ष तक पांच दिन तक मौन व्रत रखते हैं और इसके बाद गोकुलधाम व नंद गांव जाकर उद्यापन करते हैं। सैरा नृत्य करते हुए ये टोलियां वापस अपने मंदिर में पहुंचकर मौन व्रत तोड़ती हैं। इसके बाद नृत्य में प्रयोग किए गए डांडियों को मथुरा पहुंचकर पवित्र यमुना जी में विसर्जित कर दिया जाता है।