क्रांति पथ से संवारी जाएगी क्रांतिकारियों की विरासत
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी तालबेहट, बानपुर और बालाबेहट के किलों का होगा काया कल्प
पर्यटन विभाग ने सरकार को भेजा प्रस्ताव, बनेगा पाथवे
तालबेहट में दिखाया जाएगा लाइट एण्ड साउंड शो
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। विंध्याचल पर्वत श्रृंखला से घिरे ललितपुर जिले के प्राचीन किले व विश्व प्रसिद्ध मंदिर आज भी अपनी स्थापत्य कला के साथ ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से पर्यटकों को लुभाने की सामर्थ्य रखते हैं। देर से ही सही सरकार चेती ने जिले की बदहाल होती प्राचीन विरासत के कायाकल्प के लिए प्रस्ताव तैयार किया है। स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाली बानपुर, बालाबेहट और तालबेहट की प्राचीन रियासतों के ऐतिहासिक व पर्यटन महत्व के किलों को सजाने संवारने के लिए पर्यटन विभाग ने क्रांति पथ के नाम से एक प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजा है। इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलने पर पर्यटन विभाग सरकार की मदद से जीर्णशीर्ण किलों का कायाकल्प करेगा। इन प्राचीन इमारतों तक सड़क, पानी, बिजली के साथ ही मरम्मत कार्य भी कराया जाएगा। तालबेहट किले में लाइट एंड साउंड शो दिखाए जाने की भी योजना है।
पर्यटन विभाग द्वारा बुुंदेलखंड के ऐतिहासिक महत्व के किलों को संवारने के लिए तैयार योजना के तहत ही तालबेहट के किले में लाइट एण्ड साउंड शो दिखाए जाने की भी योजना है। इसके साथ ही बानपुर और बालाबेहट के किलों के चारों ओर चहारदीवारी, संपर्क मार्ग, पाथ-वे, साइनिज(रास्ते में इंडीकेशन युक्त उपकरण), लैंड स्केप बनाया जाएगा। पर्यटकों को बैठने के लिए बैंचें स्थापित कराई जाएगी। प्राचीन किले रात में रोशनी से जगमगाते रहें इसके लिए सोलर सिस्टम भी लगाया जाएगा। पेयजल के संसाधन के साथ ही सुलभ शौचालय की व्यवस्था भी की जाएगी। क्रांति पथ में मुख्य रोड को पर्यटन स्थलों को जोड़ने के लिए सड़कों का निर्माण भी कराए जाने की योजना है। मालूम हो कि मुख्यालय से करीब 42 किलोमीटर दूर स्थित ललितपुर बानपुर-महरौनी रोड पर स्थित यह कस्बा बानपुर प्राचीन धरोहरों के लिए जाना जाता है। इस कस्बा की स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका है। बानपुर नरेश राजा मर्दन सिंह का राष्ट्रभक्ति में दिया गया योगदान आज भी याद किया जाता है। कस्बे के मध्य में किला स्थित है, जो धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। लेकिन, आज भी इस किले की दीवारों पर की गई शानदार नक्काशी प्राचीन स्थापत्य कला की याद ताजा कर देती है। दुर्ग में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, सभा स्थल, स्नानागार, रानी महल, परकोटा, गुुर्जे, सैनिकों व सुरक्षा सामग्री के लिए भी कक्ष बनाए गए थे, इनके पुराने अवशेष मात्र ही देखने को मिलते हैं। किले में ही मुरली मनोहर, राधा-कृष्ण एवं रामदरबार के मंदिर भी स्थित हैं। किले के पास में ही मोती सागर कुआं है। ऐसा कहा जाता है कि इस किले का पानी बहुत मीठा है और यहां पास में ही हनुमानजी मंदिर भी है। इसके अलावा यहां गणेशपुरी मुहल्ले में 22 भुजाधारी नृत्य गणपति की प्राचीन अद्वितीय प्रतिमा भी स्थापित है।
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तालबेहट और बालाबेहट के किले भी रखते हैं ऐतिहासिक महत्व
ललितपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तालबेहट कस्बे का इतिहास काफी समृद्घ है। यहां ऊंची पहाड़ी पर विशाल सरोवर के किनारे राजा भारतशाह द्वारा निर्मित भारतगढ़ दुुर्ग स्थित है। किले का मुख्य द्वारा काफी भव्य है, इस पर शानदार नक्काशी उकेरी गई है। किले परिसर में मंदिर, मस्जिद और मजार भी बने हैं। किले के दो प्रवेश द्वारों में हाथी दरवाजा मुख्य है 1857 की क्रांति में राजा मर्दन सिंह की भूमिका व स्वराज आंदोलन इतिहास में दर्ज है। पर्यटन महत्व का विकास होने पर इस कस्बे की भव्यता को एक नया आयाम मिल सकता है। उधर, बालाबेहट में पुराने गोंड किले को पुनरुद्वार कर मराठा सेनापति गंगाधरराव द्वारा बनवाया गया था। अब यह किला जीर्णशीर्ण अवस्था में है। लेकिन किले बुुर्ज, परकोटा, रानीमहल, हाथी दरवाजा और किला के पीछे कलात्मक बावड़ी भी स्थित है।
-इनका कहना है-
क्रांति पथ का प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजा गया है। प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही तीनों किले तालबेहट, बानपुर और बालबेहट का कायाकल्प कराया जाएगा। किलों का जीर्णद्धार करवाकर पर्यटकों संबंधी अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाएगी।
आरके रावत, उपनिदेशक पर्यटन विभाग।