सत्रह साल बाद भी नहीं बनी औषधि वाटिका
ललितपुर। बुंदेलखंड में ललितपुर वन क्षेत्र औषधीय जड़ी बूटियों से समृद्ध रहा है, पर सही तरीके से संरक्षण व संवर्धन नहीं हो पाने के कारण यह औषधियां धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहीं हैं। वन विभाग ने 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल में पृथक से कोई औषधीय वाटिका तैयार नहीं की है। ऐसे में कई दुर्लभ प्रजाति की जड़ी बूटी विलुप्त होने लगी हैं। वाटिका बनाने की योजना अफसर सत्रह साल बाद भी पूरी नहीं कर सके।
अति पिछड़े जनपद के रूप में पहचाने जाने वाले ललितपुर को प्रकृति ने खूब संवारा है, यहां छायादार पेड़ों के साथ औषधीय जड़ीबूटी का भंडार है। बारिश के दौरान जिले की छटा देखते ही बनती है। 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल में विभिन्न प्रकार की औषधीय जड़ी बूटी पाई जाती हैं। वर्ष 2000 में भारत सरकार ने औषधीय जड़ी बूटी के विकास को प्राथमिकता में रखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया था। इस समिति की देखरेख में 32 औषधीय जड़ी बूटियों के संरक्षण एवं संवर्धन की योजना बनाई गई, जिन जड़ीबूटियों को चिह्नित किया गया, उनमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, ब्राह्मी, चंदन, चिराता, गुग्गल, इसबगोल, जटामांसी, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, पिप्पली, दारुहल्दी, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, मकोय, वत्सनाम शामिल थीं। उस दौरान स्थानीय अफसरों ने इसकी कार्ययोजना बनाकर भारत सरकार को भेज दी थी। इसमें शासन की ओर से धनराशि अवमुक्त नहीं हुई। इसके उपरांत न तो भारत सरकार और न ही स्थानीय अफसरों ने जड़ी बूटी की सुध ली। विडंबना यह है कि सत्रह साल बीतने के बाद भी समूचे वन क्षेत्र में एक भी औषधीय वाटिका विकसित नहीं हो पाई। वर्तमान में जड़ी बूटी की विभिन्न प्रजातियां देखरेख के अभाव में विलुप्त हो रही हैं। वहीं, अर्जुन के पेड़ सहित कई औषधीय पौधों की छालें निकालने से उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो गया है।
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इतने प्रकार की हैं जड़ी बूटी
ललितपुर, देवगढ़, दूूधई, मड़ावरा, मदनपुर व गौना वन रेंज में अश्वगंधा, प्लाश, शंखपुष्पी, भूमि आंवला, खेर के बीज, गांद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस, रोहिणी, चितावर, धमिन, केस, केवरी, कालीगुलीसर, सफेद गुलीसर, गुलाखड़ी, त्रवी (निशोदा), बड़ा निशोदा, कसकनी, गगफूला, सफेद सहसमूली, चिराता, शिवनंलगी, हरसिंगार, धतूरा, वनतुलसी, भाषपर्जी, गुमची, कंदेरी, कान्दा, टेशफूल, गुड़मार, गैठीकांद, गुलशकारी, बाचल, बेलगिरी, काममेघ, सतावर, दारुहल्दी, सेन्ना, विनका, ब्राह्मी, आंवला, कौच, जटामांसी, कुटकी, पिप्पली, इसबगोल, गिलोय, चित्राका, वनककरी, सर्पगंधा, अशोक, कथ, कुचला, चिराता, बहेड़ा जड़ी बूटी पाई जाती है।
वर्ष 1997-98 से जिले में जड़ी बूटी एकत्रीकरण, भंडारण एवं विपणन कार्य वन निगम के पास है। इसी विभाग के पास ही संग्रहण मूल्य करने का अधिकार है। इसके बाद भी जिले में इसका कार्यालय नहीं है, जिससे जड़ी बूटी कारोबारी इसका भंडारण कर मालामाल हो रहे हैं।
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शासन से नहीं मिला धन
आयुष मिशन के अंतर्गत कार्ययोजना बनाकर शासन को भेजी गई थी। इसमें अभी तक धनराशि उपलब्ध नहीं हो सकी है। विभाग अपने स्तर से जड़ी बूटी के संरक्षण, संवर्धन में लगा है। उन्होंने माना कि वन क्षेत्र में पृथक से कोई औषधीय वाटिका नहीं है।
वीके जैन, प्रभागीय निदेशक
सामाजिक वानिकी प्रभाग ललितपुर