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रामलीला के मंचन में दर्शकों का आकर्षण बढ़ा रहे पर्दे

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रामलीला के मंचन में दर्शकों का आकर्षण बढ़ा रहे पर्दे
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छह अक्तूबर से तालाबपुरा में प्रारंभ होगी रामलीला
बिट्रिशकाल से ललितपुर में हो रहा रामलीला का मंचन
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। ललितपुर शहर में रामलीला का मंचन बिट्रिशकाल से चला आ रहा है। आज भी इसे देखने के लिए दर्शक खुद ब खुद मंचन स्थल पर खिचें चले जाते हैं। वहीं, मंचन में सजाए जा रहे पर्दे दर्शकों को लुभाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। इसमें जंगल, अशोक वाटिका, समुद्र, पंचवटी का पर्दा आदि प्रमुख हैं।
रामलीला मंचन में जहां कलाकारों का अभिनय दर्शकों को प्रभावित करता है। वहीं, मंचन में सजाए जाने वाले पर्दो की भूमिका कम नहीं है। बदले दौर में पर्दो को आकर्षक बनाने के लिए उनमें फ्लोरोसेंट रंग का इस्तेमाल हो रहा है। ललितपुर शहर में रामलीला मंचन का इतिहास काफी पुराना है। बिट्रिशकाल में नदीपार स्थित रामलीला मैदान में इसका आयोजन किया जाता था, इनके कलाकारों का शृंगार चौबयाना स्थित रघुनाथ मंदिर में होता था। इसके उपरांत कलाकार रामलीला मैदान पहुंचते थे। रघुनाथ मंदिर से कलाकारों का बकायादा तख्त (शोभायात्रा) निकाला जाता था। इस दौरान राम, रावण, मेघनाद, सीता, हनुमान आदि स्वरूप एक साथ बैठकर निकलते थे। लेकिन मैदान पर पहुंचते ही इनमें भीषण संघर्ष प्रारंभ हो जाता था। यहां से लौटते समय नगरवासी कलाकारों को रोककर उनकी आरती उतारते थे। जिस दिन राम रावण युद्ध होता था तब रामलीला मैदान में दर्शकों की भीड़ देखते ही बनती थी। करीब चार दशक पहले श्री नृसिंह मंदिर रामलीला मंदिर ने रामलीला के मंचन की जिम्मेदारी संभाली तो रामलीला मैदान में मंचन राम, रावण युद्घ तक सीमित रह गया, तब से लेकर आज तक यही परंपरा चली आ रही है। प्रख्यात चित्रकार ओमप्रकाश बिरथरे कहते हैं कि मंचन में पर्दे की भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता है। इससे वातावरण का सृजन होता है। 17 गुणा 15 फिट का पर्दा एक प्रसंग समाप्त होते ही दर्शकों के सामने लाया जाता है। इस तरह मंचन में विभिन्न तरह के पर्दों का इस्तेमाल होता है। इसमें जंगल का पर्दा, समुद्र का पर्दा, पंचवटी का पर्दा आदि शामिल हैं। एक पर्दा को बनाने में पांच से सात दिन का समय लगता है। इसमें मिट्टी के रंग, जिंक आक्साइड, हिरमिची, गेरू, पियोड़ी, नील, सरेस व फेवीकॉल का प्रयोग होता है। फ्लोरोसेंट रंग से पर्दा देखने में सुंदर व आकर्षक लगने लगता है। किष्किंधा कांड, पुष्प वाटिका के पर्दे पिछले दिनों तैयार किए हैं तो पंचवटी व अयोध्या नगरी के बाजार का पर्दा गत वर्ष बनाया था। उन्हें कला के क्षेत्र में आने की प्रेरणा नाना वृंदावन लाल पुजारी मिली जो रामलीला के कलाकारों का श्रृंगार किया करते थे। उनके बाद श्रंगार का जिम्मा उन्हें संभालने का मौका मिला। यही से कला के क्षेत्र में आ गए। आज भी भगवान की मूर्तियों का श्रृंगार व पर्दा बनाने का काम करते हैं।
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टूटी परंपरा
भरत मिलाप व राजगद्दी के मंचन की परंपरा टूट गई है। पूर्व के वर्षो में भरत मिलाप का मंचन घंटाघर प्रांगण में तो राजगद्दी का मंचन रघुनाथ जी बड़ा मंदिर परिसर में हुआ करता था। इन दोनों ही स्थानों में दर्शक बड़ी संख्या में जुटते थे। यही नहीं, दशहरा पर रामलीला मैदान में शमी की पत्तियां एक दूसरे को दी जाती थी। जिनके मतभेद व बुराइयां सालभर रहती थी, उन्हें इस दिन एक दूसरे से मिलाया जाता था।
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दुहाई तक सीमित हुई तख्त की परंपरा
पूर्व के वर्षो में रामलीला मंचन की शुरुआत से लेकर राम रावण युद्ध तक तख्त (शोभायात्रा) निकलता था। बदले दौर में रावण की दुहाई तक तख्त सीमित रह गया है। चित्रकार बताते हैं कि बीते वर्षो में रावण का पुतला बैलगाड़ी में रखकर मुख्य मार्गों से होते हुए रामलीला मैदान पहुंचता था। जहां उनका दहन किया जाता था। अब इसे घुमाने की परंपरा खत्म हो गई। वर्तमान में रावण का पुतला रामलीला मैदान में ही रखा जाता है।
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