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नारद मोह के साथ हुआ रामलीला का भव्य शुभारंभ

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नारद मोह के साथ हुआ रामलीला का भव्य शुभारंभ
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ललितपुर।
तालाबपुरा स्थित श्रीनृसिंह रामलीला मैदान में सोमवार से श्रीरामलीला का शुभारंभ नारद मोह के साथ हुआ। रामलीला के प्रथम दृृश्य में श्रीगणेश पूजन के साथ किरदारों द्वारा मंचन किया गया।
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श्रीनृसिंह रामलीला समिति तालाबपुरा के तत्वावधान में सोमवार की रात से रामलीला का मंचन का शुभारंभ किया गया। रामलीला का शुभारंभ जिलाधिकारी मानवेंद्र सिंह ने फीता काटकर किया। उन्होंने कहा कि रामलीला के मंच पर 15 दिन राम के जीवन से जुड़े एवं समाज में एक जुट रहकर मर्यादा में रहकर काम करना चाहिए और अच्छी से अच्छी बातें राम के चरित्र से सीखकर समाज में बदलाव लाएं। इसके बाद रामलीला के मंच ने लीला का मंचन शुरु किया गया। मंचन के दौरान लीला के प्रथम दृृश्य में श्रीगणेशजी की पूजा कर आरती की गई। इसके उपरांत नारद मोह की लीला का मंचन किया गया। मंचन में बताया कि नारद बड़े ही तपस्वी और ज्ञानी ऋषि हुए जिनके ज्ञान और तप की माता पार्वती भी प्रशंसक थीं। तब ही एक दिन माता पार्वती शिव से नारद मुनि के ज्ञान की तारीफ करने लगीं। भगवान शिव ने पार्वती को बताया कि नारद बड़े ही ज्ञानी हैं, लेकिन किसी भी चीज का अंहकार अच्छा नहीं होता है। एक बार नारद को इसी अहंकार (घमंड) के कारण बंदर बनना पड़ा था। यह सुनकर माता पार्वती को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान से पूरा कारण जानना चाहा। तब श्री शिव ने बतलाया। इस संसार में कोई कितना ही बड़ा ज्ञानी हो, लेकिन हरि जो चाहते हैं वो उसे बनना ही पड़ता है। नारद को एक बार अपने इसी तप और बुद्धि का अहंकार (घमंड) हो गया था । इसलिए नारद को सबक सिखाने के लिए विष्णु को एक युक्ति सूझी। हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थीं। वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यंत सुहावनी लगी। वहां पर के पर्वत, नदी और वन को देख कर उनके हृदय में श्रीहरि विष्णु की भक्ति अत्यंत बलवती हो उठी और वे वहीं बैठ कर तपस्या में लीन हो गए। नारद मुनि की इस तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए कि कहीं देवर्षि नारद अपने तप के बल से उनका स्वर्ग नहीं छीन लें। इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिये कामदेव को उनके पास भेज दिया। वहां पहुंच कर कामदेव ने अपनी माया से वसंत ऋतु को उत्पन्न कर दिया। पेड़ और पत्ते पर रंग-बिरंगे फूल खिल गए कोयले कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे। कामाग्नि को भड़काने वाली शीतल मंद सुगंध सुहावनी हवा चलने लगी। रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं। कामदेव की किसी भी माया का नारद मुनि पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद मुझे शाप न दे दें। इसलिए उन्होंने श्री नारद से क्षमा मांगी। नारद मुनि के मन में अहंकार हो गया कि मैंने कामदेव को जीत लिया। वहां से वे शिव जी के पास चले गए और उन्हें अपने कामदेव को हारने का हाल कह सुनाया। भगवान शिव समझ गए कि नारद को अहंकार हो गया है। भगवान शंकर ने नारद से यह बात विष्णु को न बताने को कहा। लेकिन नारद नहीं माने और क्षीरसागर पह़ुंचे गए और शिव जी के मना करने के बाद भी सारी कथा उन्हें सुना दी। भगवान विष्णु समझ गए कि आज तो नारद को अहंकार (घमंड) ने घेर लिया है। तब श्रीहरि ने अपनी माया से नारद जी के रास्ते में एक बड़े ही सुन्दर नगर को बना दिया । उस नगर में शीलनिधि नाम का वैभवशाली राजा रहता था। उस राजा की विश्व मोहिनी नाम की बहुत ही सुंदर बेटी थी, जिसके रूप को देख कर लक्ष्मी भी मोहित हो जाएं। विशऊ्व मोहिनी स्वयंवर करना चाहती थी इसलिए कई राजा उस नगर में आए हुए थे। नारद भी वहां पहुंच गए। यहां राजा ने नारद से अपनी कन्या की हस्तरेखा देखने को कहा, तब नारद ने कन्या की हस्तरेखा देखी और पाया कि उस कन्या के साथ जो विवाह करेगा वह अमर हो जाएगा। नारद जी ने सोचा कि कुछ ऐसा उपाय करना चाहिए कि यह कन्या मुझसे ही विवाह करे। ऐसा सोचकर नारद जी ने श्री हरि को याद किया और भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हो गए। नारद जी ने उन्हें सारी बात बताई और कहने लगे, हे नाथ आप मुझे अपना सुंदर रूप दे दो, ताकि मैं उस कन्या से विवाह कर सकूं। भगवान हरि ने कहा हे नारद, हम वही करेंगे जिसमें तुम्हारी भलाई हो। यह सारी विष्णुजी की ही माया थी । विष्णु जी ने अपनी माया से नारद जी को बंदर का रूप दे दिया । नारद जी को यह बात समझ में नहीं आई। वो समझे कि मैं बहुत सुंदर लग रहा हूं। वहां पर छिपे हुए शिव जी के दो गणों ने भी इस घटना को देख लिया। स्वयंवर में स्वयं भगवान विष्णु भी एक राजा का रूप धारण कर आ गए। विश्व मोहिनी ने कुरूप नारद की तरफ देखा भी नहीं और राजा रूपी विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। मोह के कारण नारद मुनि की बुद्धि नष्ट हो गई थी । राजकुमारी द्वारा अन्य राजा को वरमाला डालते देख वे परेशान हो उठे। उसी समय शिव जी के गणों ने ताना कसते हुए नारद जी से कहा जरा दर्पण में अपना मुंह तो देखिए। मुनि ने जल में झांक कर अपना मुंह देखा और अपनी कुरूपता देख कर गुस्सा हो उठें। गुस्से में आकर उन्होंने शिवजी के उन दोनों गणों को राक्षस हो जाने का शाप दे दिया। उन दोनों को शाप देने के बाद जब मुनि ने एक बार फिर से जल में अपना मुंह देखा तो उन्हें अपना असली रूप फिर से मिल चुका था। नारद के शाप को विष्णु ने स्वीकार कर लिया और उन पर से अपनी माया को हटा लिया। माया के हट जाने से अपने द्वारा दिए शाप को याद कर के नारद जी को बहुत दुख हुआ किंतु दिया गया शाप वापस नहीं हो सकता था। इसीलिए श्री विष्णु को श्री राम के रूप में मनुष्य बन कर अवतरित होना पड़ा। साथ ही नारद के श्राम की वजह से विष्णु को राम अवतार में बंदरों से ही मदद लेनी पड़ी। कार्यक्रम की अध्यक्षता चंद्रभूषण चंद्रभूषण सिंह बुंदेला ने की। जबकि यहां मुख्य संरक्षक भगवत नारायण अग्रवाल, कैलाश सिंह यादव, रामलीला समिति के अध्यक्ष भवानी सिंह यादव, कोषाध्यक्ष अलिखेश पाठक, महामंत्री भरत पुरोहित, नरेंद्र कड़ंकी, पप्पू राजा रोंड़ा, पवन जायसवाल, पन्नालाल साहू, जगदीश पाठक, बद्री पाठक, हरिसिंह यादव, धर्मेंद सिंह यादव, सुबोध गोस्वामी, अजय तोमर, छोटू साहू, रामगोपाल नामदेव, अमित लखेरा, आलोक खरे, पंकज रायकवार आदि उपस्थित रहे।
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