साठ साल में नगर की जलापूर्ति का हो गया बेड़ागर्क
ललितपुर। छह दशक पहले शहरवासियों की प्यास बुझाने के लिए जलापूर्ति का ढांचा खड़ा किया गया था, जिससे शहरवासियों को 24 घंटे पानी मिलता था। लेकिन, बदले दौर में अब केवल सुबह के समय बमुश्किल आधा घंटे की जलापूर्ति हो रही है। उसमें भी महीने में एकाध दिन आपूर्ति बाधित रहती है। इस स्थिति को देख शहरवासी विकास के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
लोकसभा चुनाव में नौ हजार करोड़ रुपये से बुंदेलखंड के गांवों की प्यास बुझाने की चर्चा हो रही है। इससे इतर, यदि नगर की पेयजल आपूर्ति व्यवस्था पर नजर डालें तो शहरवासी पेयजल की समस्या को लेकर बेहद परेशान हैं। जल संस्थान सुबह के समय केवल आधे घंटे ही पेयजल की आपूर्ति कर पा रहा है। उसमेें भी कभी संस्थान के कर्मचारी वेतन को लेकर हड़ताल कर देते हैं तो कभी पाइप लाइन का वाल्व, साइफन व मोटर खराब हो जाती है। इससे आपूर्ति बाधित हो जाती है।
साठ साल पहले शहर में पेयजल का भरपूर इंतजाम था। वर्ष 1958 में तत्कालीन राज्य सरकार ने 13 लाख बयालीस हजार पांच सौ रुपये कर्ज के रूप में मुहैया कराए थे। इस राशि से नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. शादीलाल दुबे ने नगर को 24 घंटे शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया था। मौजूदा हालात को देख बुजुर्ग व्यक्ति पूर्व की व्यवस्था को याद कर लेते हैं। उनका आरोप है कि नगर में वर्षों पुरानी पाइप लाइनों को बदला नहीं गया है। ललितपुर पेयजल पुनर्गठन योजना में लाखों रुपये खर्च किया जा चुका है। इस राशि का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ है। जल निगम ने जो नई पाइप लाइन डाली, उसे ऊंचाई वाले क्षेत्र से ले जाने की जगह निचले क्षेत्रों में बिछा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि ऊंचाई वाले इलाके के लोगों को इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वहीं, अम्रुत योजना के कनेक्शन पूर्व से बिछी लाइनों में ही दे दिए गए, जिससे पाइप लाइनों में पानी का प्रेशर कम हो गया। इतना ही नहीं, विभागीय अफसर मेन राइजिंग पाइप लाइन में कनेक्शन नहीं रोक पाए। इससे यह हुआ कि मेन राइजिंग पाइप लाइन के कनेक्शनधारी भरपूर पानी लेते हैं, जबकि कई मुहल्लों में पानी नहीं पहुंच पाता है। यहां तक कि टंकियां भी क्षमता के अनुसार नहीं भर पाती हैं।
विभिन्न मोहल्लों से निकली पाइप लाइनों में लीकेज बने हुए हैं, जिन्हें सुधारा नहीं जा रहा है। जल संस्थान के अधिकारी और कर्मचारी धन की कमी का रोना रोते रहते हैं, ऐसे में सुचारु जलापूर्ति की बात बेमानी है। विभाग के अधिकारी और कर्मचारी मौके का मुआयना नहीं करते हैं कि कमियां कहां हैं? जब तक अधिकारी कार्यालय नहीं छोड़ेंगे, तब तक उनके समक्ष वास्तविक स्थिति ही सामने नहीं आएगी। इन सब बिंदुओं पर यहां के जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों को विचार करना होगा, तब ही नगर की जलापूर्ति पुराने स्वरूप में लौट पाएगी।
जिस तेजी से आबादी बढ़ी है, उस तेजी से पेयजल पर ध्यान नहीं दिया गया है। वर्षों पुरानी पाइप लाइनों से आज भी आपूर्ति हो रही है। कई जगहों पर पाइप लाइन विस्तार नहीं हो पाया है तो ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पानी पहुंचाने के कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं। इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
- शीलचंद जैन
जब तक नगर पालिका के हाथों में जलापूर्ति की व्यवस्था रही, तब तक सबकुछ ठीक रहा। जैसे ही जल संस्थान ने स्वतंत्र रूप से इसे अपने हाथों में लिया, वैसे ही शहर की जलापूर्ति कमजोर होने लगी। आमतौर पर देखा जाता है कि कर्मचारी अपने दायित्वों के प्रति बेपरवाह होते हैं। इन सब स्थितियों के लिए कहीं न कहीं भ्रष्टाचार भी जिम्मेदार है।
- अशोक कुमार जैन
आबादी बढ़ने से पानी की खपत बढ़ गई है। पहले बहुत कम लोगों के पास शौचालय थे, लेकिन अब सर्वाधिक पानी शौचालयों में खर्च हो रहा है। प्रयास किया जा रहा है सबको पानी मिले।- प्रवीण यादव, अधिशासी अभियंता, जल संस्थान