कुपोषण मुक्त गांव कहलाएंगे अब सुपोषित गांव
सुपोषित गांव बनाकर कुपोषण और एनीमिया पर वार
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। अब प्रदेश में कुपोषण मुक्त गांवों को सुपोषित गांव के रूप में पहचाना जाएगा। मुख्यमंत्री सुपोषण घर की शुरुआत प्रदेश के 10 सबसे पिछड़े जिलों में की गई है। किसी भी गांव को सुपोषित गांव घोषित करने के लिए मानक तय कर दिए गए हैं, जिन्हें पूरा करना अनिवार्य किया गया है।
प्रदेश में व्याप्त कुपोषण की दर में कमी लाने के मकसद से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 अगस्त को पोषण अभियान का शुभारंभ किया था। इसमें जन्म के समय कम वजन, बच्चों में व्याप्त कुपोषण व सभी आयु वर्गों में एनीमिया की दरों में कमी लाना है। अब मुख्यमंत्री सुपोषण घर की शुरुआत प्रदेश के 10 सबसे पिछड़े जिलों में की गई है। शासन ने 11 अक्तूबर से चलाये जा रहे कुपोषण मुक्त गांव को संशोधित कर दिया गया है। अब ऐसे गांवों को सुपोषित गांव के रूप में पहचाना जाएगा। सुपोषित गांव जिनमें राजस्व गांव हो सकते हैं या पूर्व में अधिकारियों के द्वारा गोद लिए गए गांव भी हो सकते हैं। चयनित गांवों को दो कोर व नौ अन्य मानकों को पार करना होगा। कोर मानक आउटकम आधारित है। इनका फोकस कुपोषण एवं एनेमिया की दर में कमी लाना है। जिसमें सभी विभागों को साथ मिलकर कार्य करना है। किसी भी गांव को सुपोषित गांव घोषित करने के लिए मानक तय किए गए हैं। इसमें चयनित राजस्व गांव की प्रगति 100 अंकों की कसौटी पर कसा जाएगा। 80 फीसदी अंक लेने वाले राजस्व गांव ही सुपोषित गांव के लिए पात्र माने जाएंगे। ऐसा गांव ही सुपोषित गांव होंगे, जहां पर 0 से पांच वर्ष के किसी भी बच्चे का वजन लाल व पीली श्रेणी में न आता हो। 90 फीसदी गर्भवती महिलाओं ने गर्भावस्था के प्रथम त्रैमास में पंजीकरण कराया हो और आखिरी त्रैमास में 10 फीसद से अधिक गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित न हो। 90 फीसद लाल व पीली श्रेणी के साथ कुपोषित बच्चों के घर हर माह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा भ्रमण किया गया हो, जहां लाल व पीली श्रेणी के बच्चों की हर त्रैमास में कम से कम एक बार स्वास्थ्य जांच हुई हो और उन्हें परामर्श मिला हो। 90 फीसद स्कूल जाने व स्कूल न जाने वाली किशोरियों ने पिछले 6 माह में कम से कम 24 आयरन गोलियां विटामिन सी युक्त खाद्य पदार्थ के साथ ली हो। स्थानीय खाद्य पदार्थ जैसे गुड़, चना, सहजन, आंवला सेवन प्रोत्साहन की गतिविधियां हुई हों। इसके अलावा आंगनबाड़ी केंद्र पर 90 फीसद लाभार्थियों को प्रत्येक माह नियत तिथि पर पुष्टाहार बांटा गया हो। 50 फीसद लाल, पीली श्रेणी व कुपोषित बच्चों के परिवारों को मनरेगा से रोजगार मिला हो। पिछले छह माह में कम से कम 30 सामुदायिक गतिविधियों का आयोजन आंगनबाड़ी केंद्र पर हुआ हो। गांव को सुपोषित बनाने की अवधि छह माह की होगी। किसी भी गांव को सुपोषित गांव घोषित करने से पूर्व कम से कम 2 माह तक उस गांव के मानकों में स्थिरता होनी चाहिए। सुपोषित गांव की सूचना आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व प्रधान के संयुक्त हस्ताक्षर से मुख्य सेविका को भेजी जाएगी। पहले चरण का सत्यापन मुख्य सेविका के स्तर से होगा। जो गांव आवश्यक मानकों पर 80 फीसदी या उससे अधिक अंक प्राप्त करते हैं, उनकी सूची जनपद स्तर पर भेजी जाएगी। फिर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में एक सत्यापन समिति बनाई जाएगी। दूसरे चरण में इसी समिति के द्वारा सुपोषण गांव की सूचना का सत्यापन किया जाएगा। तीसरे चरण में प्रत्येक जनपद द्वारा सूचित गांवों का सत्यापन बाह्य संस्थाओं जैसे यूनिसेफ़, टीएसयू, टाटा ट्रस्ट, आदि प्रतिनिधियों द्वारा करवाया जाएगा। उसके बाद ही गांव को सुपोषित गांव घोषित किया जाएगा। सुपोषित गांव एक मॉडल की तरह प्रस्तुत किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त कुपोषण की दरों में कमी लाने का प्रयास प्रत्येक गांव में किया जाएगा। सुपोषित गांव बनाने की प्रक्रिया सतत रूप से चलती रहेगी।
बाइस को बुलाई बैठक
सुपोषित गांव के मानकों को पूरा करने के निर्देश प्राप्त हुए हैं। इस संबंध में बाइस जनवरी को सीडीपीओ व मुख्य सेविकाओं को बुलाया जाएगा। इस बैठक में गांवों का चिह्नींकरण किया जाएगा।
पुष्पा वर्मा, जिला कार्यक्रम अधिकारी