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लाखों रुपये की लागत से तैयार सचिवालय हैं बदहाल

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लाखों रुपये की लागत से तैयार सचिवालय हैं बदहाल
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उठ रहे ग्रामीण सचिवालयों के अस्तित्व पर सवाल
ग्रामीणों ो नहीं मिल पाती योजनाओं की जानकारी
किसी में बांधे जा रहे जानवर तो किसी में रखे जा रहे कंडे और भूसा
अमर उजाला ब्यूरो
सिलावन (ललितपुर)। ग्रामीण इलाकों में पंचायती राज कायम करने के उद्देश्य से ग्राम पंचायतों में ग्रामीण सचिवालय भवन का निर्माण कराया गया हैं। लेकिन ग्रामीण इन सचिवालय भवनों के अस्तित्व पर सवाल उठा रहे हैं। वजह हैं कई ग्राम पंचायतों में सचिवालय भवनों के निर्माण के बाद भी आज तक ताले तक नहीं खुले हैं। किसी भवन में जानवर आदि बंधे हैं तो किसी में कंडे, भूसा आदि रखा हुआ हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को योजनाओं की जानकारी के लिए मुख्यालय तक जाना पड़ता हैं। अधिकारियों की उदासीनता के चलते सरकार की मंशा पर पानी फिरता दिखाई दे रहा हैं।
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ग्रामीण इलाकों में अधिकारियों के पहुंचने पर अक्सर गांव से संबंधित अभिलेखों के मौके पर न होने की कमी अखरती रही हैं। गांव से संबंधित तमाम निर्णय इसी वजह से नहीं हो पाते हैं। ऐसे में पंचायतीराज की मंशा भी अपूर्ण रह जाती हैं। इन हालातों से उबरने के लिए भारत सरकार ने ग्रामीण इलाकों में सचिवालय निर्माण का निर्णय लिया। निर्माण के िलिए ग्राम पंचायतों ने स्थानों का चयन किया और सरकार ने सोलह लाख पचास हजार रुपये प्रति सचिवासलय की लागत से धनराशि जिला पंचायत को सौंप दी। जनपद की लगभग चार सौ ग्राम पंचायत में सचिवालय भवनों का निर्माण कार्य हुए कई वर्ष व्यक्ति हो गए, लेकिन अधिकतर ग्राम पंचायतों में सचिवालय के ताले तक नहीं खुले हैं। निर्मित सचिवालय जहां गौशाला आदि बनकर रह गए हैं। वही कंडे, भूसा आदि रखने के लिए सुरक्षित स्थान भी बने हुए हैं। गांव में सचिवालय भवन होने के बाद भी उसका उपयोग नहीं करने के चलते ग्रामीण उसके अस्तित्व पर सवाल उठा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना हैं कि सचिवालय में कामकाज नहीं होने के कारण एक तो उन्हें योजनाओं की जानकारी नहीं होती हैं दूसरा अधिकारी व जनप्रतिनिधि गुपचुप तरीके से खुली बैठक कर लेते हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन में कितनी पारदर्शिता होगी। इतना ही नहीं कई पंचायतों के ग्रामीण तो सचिवालय निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवालिया निशान लगाते हैं। जानकारी तो यहां तक हैं कि कई सचिवालय भवनों में फर्नीचर स्थापना के नाम पर भी धननिकासी हो चुकी हैं, लेकिन उक्त भवनों का फर्नीचर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के घरों की शोभा बढ़ा रहा हैं। ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराया हैं।
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