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-किसानों के लिए परेशानी पैदा कर रहे आवारा जानवर

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आवारा गोवंश बने किसानों के लिए मुसीबत
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शाम ढलते ही सड़कों पर डेरा डालते हैं पशुधन
वाहनों की आवाजाही के दौरान हो रही भारी दिक्कत
अमर उजाला ब्यूरो
सौंरई (ललितपुर)। बुंदेलखंड में अन्ना प्रथा अब किसी विपदा से कम नहीं है। इस प्रथा के बदस्तूर जारी रहने से किसानों की परेशानी कम नहीं हो रही हैं। चैत्र माह में फसल कटाई के बाद से गोवंश को खुला छोड़ दिया जाता है। लेकिन जब खरीफ फसल तैयार होती है तो खुले में विचरण कर रहे गोवंश मौका पाकर चट कर जाते हैं। वहीं, वाहनों की आवाजाही में बाधक बने हैं।
मड़ावरा तहसील क्षेत्र के अधिकांश गांवों में तो अन्ना गोवंशों की छांट-छांट सड़क किनारे शाम ढलते देखी जा सकती है। खासकर तहसील मुख्यालय से सटे हुए गांव बम्हौरी कलां की बात करें तो यहां के किसान बताते है कि रबी और खरीफ की फसलों की उपज करने के लिए हमें खेतों पर ही डेरा डालना होता है। यहां अन्ना गोवंशों की संख्या इतनी अधिक है कि इनसे पेश पाना मानो फसल उपजने में जटिल समस्या आड़े होती है। जो कि दिन के समय फसलों का स्वाहा करती हैं और शाम होते ही सड़क पर विचरण करती है। अधिकांश गोवंश सड़क पर ही बैठते है। जो कि वाहन चालकों के लिए बड़ा सर दर्द बनती हैं। बम्हौरी कलां गांव के धौरीसागर तिराहे पर परचून की दुकान खोले बखत सिंह लोधी बताते हैं कि यहां पिछले कई वर्षों से यही हालत बने हुए है नतीजतन पिछले वर्ष ही अज्ञात ट्रक चालक द्वारा बड़ी ही निर्ममता के साथ लगभग एक दर्शन गोवंशों को कुचल दिया गया था। क्षेत्रीय जनसमुदाय द्वारा और समाजसेवियों द्वारा इसकी कड़ी आलोचना हुई, और अन्ना गोवंशों को एक सुगम गौशाला यहां खोले जाने की मांग की गई जिसपर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
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सौंरई बसस्टैंड पर दुकान खोले हुए रामनरेश बताते हैं कि हालात इतने बदतर हैं कि शाम होते ही सड़क पर अन्ना गोवंश अपना डेरा डाल चुके होते है। इनकी संख्या इतनी अधिक होती है कि इन्हें सड़क से दूर हटाना भी बेहद मुश्किल और खतरनाक होता है। क्योंकि इनके आसपास पहुंच पाना मानों चुनौती से कम नहीं होता। इनके नुकीले सींग किसी को भी घात कर सकते हैं।
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